आलेख

संचारक और राष्ट्र निर्माण

आलेख : डॉ. अंशुला गर्ग

लोकतंत्र का चतुर्थ स्तंभ कहलाए जाने वाला मीडिया यानि कि संचारकों की एक टोली भारत देश का एक अभिन्न अंग प्रतीत होता है, जिससे लगता है राष्ट्र निर्माण की संपूर्ण जिम्मेदारी संचारकों पर ही है। विश्लेषण करने पर मालूम पड़ता है कि संचारकों ने विभिन्न प्रकार से राष्ट्र निर्माण में पूर्ण रूपेण अपनी भूमिका निभाई है। जिसमें सूचना का प्रचार व प्रसार, विभिन्न समसामयिक मुद्दों पर चर्चा में बढ़ोतरी, सकारात्मक संदेश व विमर्श को लेकर जनता के मध्य पहुंचाना, गलत सूचनाओं का विरोध व सही का समर्थन, संपूर्ण समाज में सामंजस्य और एकता की स्थापना, शिक्षा के माध्यम से जनजागरूकता, विभिन्न संचार कौशल का नागरिक पत्रकारों को प्रशिक्षण, समाज के कमजोर वर्ग का सशक्तिकरण, सामुदायिक व आर्थिक विकास, नैतिक मूल्यों के प्रति जनजागरूकता, संचार प्रौद्योगिकी के द्वारा डिजिटलीकरण के प्रति जानकारी और राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय स्तर पर राष्ट्र की पहचान आदि प्रमुख योगदान संचारकों द्वारा दिए गए हैं। सूचनाओं के आदान प्रदान में संचार साधनों ने सजग प्रहरी का कार्य किया है।
विकास एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है। समाज में सकारात्मक परिवर्तन को विकास की संज्ञा दी जाती है। विकास और संचार एक ही सिक्के के दो पहलू है। समाज का निर्माण एवं विकास पारस्परिक संबंध व आपसी जागरूकता के परिणामस्वरूप होता है। पारस्परिक संबंध एवं जागरूकता दोनों संचार के बिना संभव नहीं हैं। आज मानव मानव के बीच हम संचार के जिन रूपों को देखते हैं, उन्हें देखते हुए यह कल्पना करना असंभव सा लगता है कि अपनी उत्पत्ति के बाद विकास के आरंभिक दौर में मानव और संचार का रिश्ता क्या रहा होगा। आदिमकाल में मानव पूर्णरूपेण स्वतंत्रा था और उसके व्यवहार पर नियंत्रण के लिए कोई सामाजिक नियम आदि नहीं थे। मनुष्य क¢वल प्रकृति के नियमों के अनुसार ही चलता था। मानव सभ्यता के विकास के साथ ही साथ मनुष्य को समूह में रहने और उसके लिए अपने कुछ नियमों की आवश्यकता महसूस हुई। संभवतः इसी आवश्यकता ने मनुष्य और मनुष्य व जीवों के बीच संचार और संवाद को जन्म दिया। इसी संवाद और संचार ने मानव समूहों को एक दूसरे के निकट लाने और उन्हें एक दूसरे के सुख-दुख जानने व उनमें भागीदार बनने में मदद की। इस तरह कई छोटे-छोटे समूह बने और बाद में ऐसे कई समूह आपस में जुड़ने लगे। कालांतर में इन्हीं समूहों के समानधर्मा लोगों ने एक समाज की रचना की। संचार मानव समाज के लिए हवा और पानी की तरह ही महत्वपूर्ण है। व्यक्ति को समाज से और समाज को व्यक्ति से जोड़ने में संचार की महत्वपूर्ण भूमिका है और इस तरह से संचार दोनों के बीच सेतु का काम करता है। समाज में ज्ञान और कौशल का विकास भी संचार के बिना संभव नहीं है। समाज के विकास के साथ ही उसे नियमित और नियंत्रित करने में भी संचार की महत्वपूर्ण भूमिका है।
भारत देश कृषि प्रधान देश है, जिसमें 80 प्रतिशत से अधिक लोग ग्रामीण क्षेत्र में निवास करते हैं। आज संचार माध्यम के कारण देश के ग्रामीण क्षेत्र भी विकास की ओर बढ़कर राष्ट्र निर्माण में अपनी अग्रणी भूमिका निभा रहे हैं। संचार साधनों की ग्रामीण निवास्य में विकास के विभिन्न पक्षों जैसे कृषि व तत्सम्बन्धी कार्यों, सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक, सांस्कृतिक व धार्मिक इत्यादि में अत्यधिक भागीदारी रही है।

संचार सेवाएँ किसी भी समाज की प्रगति का एक महत्वपूर्ण घटक हैं। तकनीकी नवाचारों ने संचार के क्षेत्र में बहुत बड़ा प्रभाव डाला है और लोगों के संचार के तरीके में अभूतपूर्व बदलाव लाया है। धुएं के संकेतों, पक्षियों और पत्रों पर निर्भर रहने से लेकर वायरलेस संदेश, फैक्स या टेलीफोन कॉल का इंतज़ार करने तक, अब हम इंस्टेंट मैसेजिंग के युग में पहुँच चुके हैं। ईमेल, फ़ोन कॉल और मैसेजिंग ऐप जैसे कई तरीके उपलब्ध हैं जो संचार को आसान, प्रभावी और हमारी उंगलियों की नोक पर उपलब्ध बनाते हैं। ज़ूम, स्काइप और गूगल टीम्स जैसे एप्लिकेशन के लोकप्रिय होने से महामारी के दौरान रिमोट वर्क कॉल करने, क्लास लेने और व्यवसाय चलाने में काफ़ी मदद मिली। जनसंचार में उन्नत प्रौद्योगिकी की शुरुआत ने मीडिया को पहले से कहीं अधिक शक्तिशाली बना दिया। सस्ते स्मार्ट फोन, इंटरनेट तक आसान पहुंच के कारण मीडिया चंद सैकेंड में सूचना का प्रसार करने में सक्षम है जोकि जल्दबाजी में और अस्पष्ट सार्वजनिक दृष्टिकोण बनाने का मुख्य स्रोत है। हालांकि, हमें सावधान रहना चाहिए कि जिस तरह अचानक आई हुई बाढ़ मानवता के लिए तबाही लाती है, उसी तरह सार्वजनिक स्थान पर अनर्गल सूचनाओं की बमवारी भी तवाही का कारण बन सकती है। गांधीजी के शब्दों में ‘‘प्रेस एक महान शक्ति है, लेकिन जैसे अनियंत्रित जल धारा समूचे क्षेत्र को जलमग्न कर देती है और फसलों को तबाह कर देती है वैसे ही बेलगाम कलम सब कुछ नष्ट कर देती है’’।

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