सिंगरौली

महदेइया व मोरवा साइडिंग से चल रहा मिलावटी कोयले का खेल, प्रशासन मौन क्यों,,?

कोल माफिया किंग की दौड़ राजनीति पार्टी में महामंत्री की ओर,,

नेशनल प्रेस टाइम्स, ब्यूरो।
सिंगरौली । सिंगरौली जिले में कोल माफिया और राजनीति का गठजोड़ एक बार फिर सुर्खियों में है। जिले में प्रतिदिन भारी मात्रा में आ रही रैक की रैक रिजेक्ट कोयला (छाई/चारकोल) आखिर जा कहां रहा है? क्यों प्रशासन इसकी अनदेखी कर रहा है? यह सवाल जिले की जनता के बीच गूंज रहा है। हर साल कुछ दिनों के लिए प्रशासन खानापूर्ति की कार्रवाई करता है। बड़ी-बड़ी बातें, दिखावे की जांच और कुछ वाहवाही भरे आदेश… लेकिन कुछ ही समय बाद वही पुराना खेल फिर से शुरू हो जाता है। जिले में रैक दर रैक रिजेक्ट कोयला उतरता है, मिलावट की मशीनरी चलती है और प्रशासनिक तंत्र चुपचाप सब कुछ होते देखता है।
महदेइया से मोरवा तक मिलावट का सिंडिकेट
सूत्रों के अनुसार महदेइया रेलवे साइडिंग में झारखंड से आने वाले रिजेक्ट कोयले को अनलोड किया जाता है। इसे मिलावट कर बेहतर क्वालिटी का कोयला छांट लिया जाता है और बाजार में ऊंचे दाम पर बेचा जाता है। बचा हुआ कोयला भस्सी और डस्ट के साथ मिलाकर “डिमांड” के हिसाब से पावर प्लांट्स को भेजा जाता है। महदेइया से मोरवा तक यह खेल लगातार जारी है। प्रतिदिन कई रैक रिजेक्ट कोयले की मिक्सिंग का आरोप है। इसका सीधा असर बिजली उत्पादन की गुणवत्ता पर पड़ रहा है और सरकारी खजाने को करोड़ों का नुकसान हो रहा है।
भाजपा नेता और डबल डीएस का कमाल !
स्थानीय सूत्रों का दावा है कि इस पूरे खेल के पीछे जिले के एक भाजपा नेता की राजनीतिक सरपरस्ती है। उनके संरक्षण में डबल डीएस नामक गिरोह मिलावट का बड़ा नेटवर्क खड़ा कर चुका है। यह नेटवर्क न केवल महदेइया बल्कि मोरवा रेलवे साइडिंग में भी सक्रिय है। सूत्र बताते हैं कि गोदावरी और प्रापक कोल कंपनी इस खेल में मुख्य भूमिका निभा रही है। ट्रांसपोर्टर, आरपीएफ, स्थानीय प्रशासनिक अधिकारी और कुछ सफेदपोश भी इसमें शामिल बताए जा रहे हैं। यही वजह है कि कार्रवाई केवल कागजों में ही रह जाती है।
चारकोल” और “भस्सी” का काला कारोबार
हर रैक में हजारों टन कोयला मिलावट के साथ तैयार कर बाहर भेजा जा रहा है। ये मिलावटी खेप ललितपुर थर्मल पावर, बजाज एनर्जी लिमिटेड और प्रयागराज पावर प्लांट तक पहुंचाई जाती है। इस गोरखधंधे से जहां निजी कंपनियां और माफिया मोटा मुनाफा कमा रहे हैं, वहीं सरकार को करोड़ों का चूना लग रहा है। झारखंड से मंगाई जाने वाली छाई यानी चारकोल को बड़े पैमाने पर कोयले में मिलाया जा रहा है। इसमें भस्सी और कोल डस्ट का भी जमकर इस्तेमाल हो रहा है। कोयले की यह मिलावट न केवल पावर उत्पादन पर असर डाल रही है बल्कि उद्योगों को भी घटिया गुणवत्ता का कोयला सप्लाई किया जा रहा है।
जांच की मांग लेकिन कार्रवाई शून्य
पिछले कई वर्षों से इस गोरखधंधे की खबरें मीडिया के जरिए सामने आती रही हैं। हर बार जिम्मेदार जांच का आश्वासन देते हैं लेकिन नतीजा वही ढाक के तीन पात। अगर प्रशासन चाहे तो एक पारदर्शी जांच के जरिए पूरे नेटवर्क का पर्दाफाश हो सकता है, लेकिन मौन स्वीकृति से लगता है मानो सभी हिस्सेदार हैं।
बड़ा सवाल
क्या जिले में राजनीति और माफिया का गठजोड़ इतना मजबूत है कि प्रशासन भी बेबस हो चुका है? क्या यह सच है कि भाजपा के एक बड़े नेता की छत्रछाया में यह खेल चल रहा है?
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