अंतरराष्ट्रीय

नेपाल के बाद अब फ्रांस में क्यों शुरू हुए प्रदर्शन

सरकार की किन नीतियों का विरोध, कितने उग्र हुए प्रदर्शन?

 

फ्रांस में क्या हो रहा है? वहां लोग सड़कों पर क्यों उतर आए हैं? सरकार की किन नीतियों और राजनीतिक संकट को लेकर प्रदर्शन किए जा रहे हैं? इन प्रदर्शनों की अगुवाई कौन कर रहा है? साथ ही मौजूदा समय में देश में क्या हाल हैं? आइये जानते हैं…

नेपाल में सोमवार और मंगलवार को सरकार के खिलाफ हुए आंदोलन की आग अभी ठंडी भी नहीं पड़ी थी कि दुनिया के एक और क्षेत्र में सरकारी नीतियों के खिलाफ प्रदर्शनों की शुरूआत हो गई है। इस बार विरोध का केंद्र है फ्रांस और निशाने पर है राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों की सरकार की नीतियां। हालांकि, नेपाल से उलट फ्रांस का प्रदर्शन सरकार के किसी अचानक लिए गए फैसले के बाद शुरू नहीं हुआ है, बल्कि इसे लेकर हलचल लंबे समय से जारी थी।

इस बीच बुधवार (10 सितंबर) को जब फ्रांस की राजधानी पेरिस में प्रदर्शनकारी सड़कों पर दिखे तो यूरोपीय देश में चिंताएं साफ देखी गईं। ऐसे में यह जानना अहम है कि आखिर फ्रांस में क्या हो रहा है? वहां लोग सड़कों पर क्यों उतर आए हैं? सरकार की किन नीतियों और राजनीतिक संकट को लेकर प्रदर्शन किए जा रहे हैं? इन प्रदर्शनों की अगुवाई कौन कर रहा है? साथ ही मौजूदा समय में देश में क्या हाल हैं? आइये जानते हैं…

पहले जानें- फ्रांस में सरकार की किन योजनाओं पर भड़के लोग?- फ्रांस में 15 जुलाई को प्रधानमंत्री फ्रांस्वा बायरू ने राष्ट्रीय बजट पेश किया था। इसमें 2026 के लिए वित्तीय योजना में खर्चों को घटाने का जिक्र था। बायरू ने एलान किया था कि फ्रांस अपने बजट खर्च को 4.38 करोड़ यूरो (करीब 452 करोड़ रुपये) घटा रहा है। इसके जरिए सरकार अपने बढ़ते आर्थिक घाटे को कम करने की कोशिश को दर्शा रही थी। हालांकि, इस बजट कटौती के अलावा तीन ऐसी चीजों को खत्म करने की बात कही गई, जिसे फ्रांस के लोग मानने के लिए तैयार नहीं दिखे।

इधर फ्रांस में बायरू सरकार ने अपनी योजनाओं को आगे रखा, उधर सोशल मीडिया पर एक बड़ा तबका इनके खिलाफ आंदोलन की तैयारी करने लगा। देखते ही देखते पोस्ट्स में वायरल हो गया, जिसका मतलब है ‘बहिष्कार, अवज्ञा और एकजुटता’। यहीं से फ्रांस में 10 सितंबर को राष्ट्रीय आंदोलन की नींव पड़ी। इन प्रदर्शनों को पहले ही- ‘ब्लॉक एवरीथिंग’ नाम दे दिया गया। यानी इस दिन सरकार की नीतियों के विरोध में लोग सड़कों पर उतरकर शहरों को जहां-तहां रोक देंगे। इस प्रदर्शन को फिलहाल सिर्फ एक दिन के लिए सीमित रखा गया है।

कौन कर रहा है प्रदर्शनों की अगुवाई?- इन प्रदर्शनों की अगुवाई ‘द सिटीजन कलेक्टिव’ नाम के संगठन की तरफ से की जा रही है, जिसमें करीब 20 आयोजनकर्ता जुड़े हैं। फ्रांस के अखबार ला परिसियन के मुताबिक, यह संगठन अपने आप को राजनीतिक दलों और अन्य व्यापार संगठनों से स्वतंत्र बताता है। सिटिजन कलेक्टिव के सोशल मीडिया हैंडल्स पर लोग #10२ीस्र३ीेु१ी2025 ंल्ल ि#10२ीस्र३ीेु१ी जैसे हैशटैग के साथ पोस्ट्स भी कर रहे हैं।

बजट की जिन योजनाओं की वजह से हो रहे प्रदर्शन, उनका सरकार पर क्या असर?-फ्रांस में जैसे-जैसे 10 सितंबर को होने वाली प्रदर्शनों का समर्थन बढ़ा, वैसे ही सरकार को आम लोगों के गुस्से का अंदाजा भी होने लगा। इस स्थिति के मद्देनजर अगस्त के आखिरी हफ्तों में प्रधानमंत्री बायरू ने संसद में सरकार और बजट को लेकर विश्वास मत लाने की बात कह दी। बायरू का मकसद था कि सरकार अगर इस बजट को पारित करा लेती है तो इसका मतलब होगा कि फ्रांस में खर्चों में कटौती को जन प्रतिनिधियों का समर्थन है। हालांकि, अगर यह पारित नहीं होता तो वे इस्तीफा दे देंगे।

इसके बाद सोमवार (8 सितंबर) को जब बजट पर वोटिंग हुई तो बायरू विश्वास मत हासिल नहीं कर पाए। ऐसे में फ्रांसीसी सरकार की योजनाएं अधर में लटक गईं।

जब बजट बनाने वाली सरकार ही गिर गई तो फिर किस बात का प्रदर्शन?

क्वीन मैरी यूनिवर्सिटी, लंदन में मॉडर्न फ्रांस के इतिहासकार एंड्रयू स्मिथ ने मीडिया आउटलेट फ्रांस 24 को बताया कि 8 सितंबर को सरकार के गिरने के बाद अब लोग आर्थिक संकट के साथ-साथ देश में बीते करीब दो साल से जारी राजनीतिक संकट को लेकर भी नाराजगी जताएंगे। गौरतलब है कि फ्रांस में 2024-25 के बीच ही राष्ट्रपति मैक्रों को सरकार चलाने के लिए पांचवां प्रधानमंत्री नियुक्त करना पड़ा है।

दरअसल, फ्रांस में फिलहाल संसद में किसी भी पार्टी के पास पूर्ण बहुमत नहीं है। ऐसे में देश में स्थायी नेतृत्व तय नहीं हो पा रहा है, न ही कोई गठबंधन साथ आकर स्थिर सरकार और प्रधानमंत्री दे पा रहा है। इसके चलते फ्रांस में कई योजनाएं लगातार अटकी हैं। कुछ फैसलों को लेकर दक्षिणपंथी पार्टियां तो कुछ नीतियों पर वाम दल सहमत नहीं दिखते। ऐसे में फ्रांस में में सेंट्रिस्ट (मध्यमार्गीय) सरकार चलाने में दिक्कतों का सामना कर रही है।

फ्रांस में वाम दल सीटों के मामले में आगे हैं, हालांकि राष्ट्रपति मैक्रों के समर्थक दलों- (रेनेसा, मोडेम और होराइजन्स) ने गठबंधन बनाया है। साथ ही कुछ दक्षिणपंथी दलों ने भी लेफ्ट को सत्ता से दूर रखने के लिए मैक्रों को ही समर्थन दिया है।

फ्रांस में क्या हैं ताजा हालात?-फ्रांस में ब्लॉक एवरीथिंग आंदोलन के दौरान कुछ प्रदर्शनकारियों ने रास्ते जाम करने के दौरान आगजनी की घटनाओं को अंजाम दिया। इस दौरान प्रदर्शनकारियों की पुलिस से भी झड़प हुई। अधिकारियों का कहना है कि उन्होंने सुबह 9 बजे तक ही 75 लोगों को हिरासत में ले लिया था, जो कि बाद में बढ़कर 200 के पार पहुंच गई।

इस बीच करीब एक लाख लोगों के सड़कों पर होने की खबर आई है। राजधानी पेरिस में पुलिस ने प्रदर्शनकारियों से निपटने के लिए आंसू गैस के गोले दागे। फ्रांस के गृह मंत्री ब्रूनो रिटेला ने कहा कि रेने शहर में एक बस में आग लगा दी गई और दक्षिण-पूर्व में ट्रेन सेवा को रोकना पड़ा है, क्योंकि पावर लाइन को नुकसान हुआ है। उन्होंने प्रदर्शनकारियों पर विद्रोह का माहौल पैदा करने की कोशिश का आरोप लगाया।

इन स्थितियों से निपटने के लिए पूरे फ्रांस में 80 हजार पुलिसकर्मी तैनात किए गए हैं। इसके बावजूद यहां प्रदर्शनकारियों ने रैली निकाली और बैरिकेड्स तोड़ने के अलावा आगजनी और कूड़ेदानों को तोड़कर सड़क पर ही कूड़ा फैला दिया। ब्लॉक एवरीथिंग आंदोलन भले ही फ्रांस को रोक देने के मकसद में सफल नहीं हुआ, लेकिन परिवहन सेवाओं और आम जनजीवन इससे बुरी तरह प्रभावित दिखा।

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