बागपत

डॉ. अभिनव तोमर, बाल रोग विशेषज्ञ का मार्गदर्शन

नवरात्रों में नवजात शिशुओं और माताओं की देखभाल के लिए विशेष सुझाव

नेशनल प्रेस टाइम्स, ब्यूरो

बागपत। नवरात्रों का पर्व भारतीय संस्कृति में शक्ति, ऊर्जा और नए जीवन का प्रतीक माना जाता है। इस पावन समय में बहुत-सी महिलाएँ व्रत रखती हैं, पूजा-अर्चना करती हैं और परिवार की खुशहाली की कामना करती हैं। ऐसे समय में यदि घर में कोई नवजात शिशु हो या हाल ही में माँ बनी महिला हो, तो उनकी देखभाल और भी अधिक संवेदनशील हो जाती है।
इसी विषय पर बागपत के प्रसिद्ध बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. अभिनव तोमर ने माताओं और शिशुओं की स्वास्थ्य सुरक्षा को लेकर कई महत्वपूर्ण सुझाव दिए हैं।


1. नवजात शिशुओं के लिए विशेष सावधानियाँ

  • स्तनपान ही सर्वोत्तम आहार : डॉ. तोमर के अनुसार जन्म के छह महीने तक शिशु के लिए माँ का दूध ही सबसे उत्तम भोजन है। चाहे नवरात्र हों या कोई भी अवसर, इस अवधि में बच्चे को पानी तक न पिलाएँ।
  • साफ-सफाई पर ध्यान : पूजा-पाठ और भीड़भाड़ वाले स्थानों पर नवजात को न ले जाएँ। इस मौसम में संक्रमण का खतरा अधिक रहता है, इसलिए बच्चे को घर के अंदर स्वच्छ वातावरण में रखें।
  • मौसम अनुसार वस्त्र : नवरात्र अक्सर बदलते मौसम का समय होता है। नवजात को न तो अधिक ढकें और न ही बहुत हल्के कपड़े पहनाएँ। शरीर का तापमान सामान्य रहे, यह जरूरी है।
  • तेल मालिश का महत्व : हल्की मालिश से शिशु की हड्डियाँ मजबूत होती हैं और रक्त संचार बेहतर होता है। लेकिन यह कार्य दिन में धूप निकलने के समय करें, न कि देर शाम या रात को।

2. नई माताओं की देखभाल

  • संतुलित आहार जरूरी : नवरात्रों में व्रत रखने वाली माताओं को डॉक्टर तोमर सलाह देते हैं कि वे फ्रूट्स, दूध, मेवे और दाल का पानी जैसे पौष्टिक विकल्प चुनें। इससे माँ को कमजोरी नहीं होगी और शिशु को भी पर्याप्त पोषण मिलेगा।
  • जल की कमी न होने दें : व्रत में अक्सर महिलाएँ कम पानी पीती हैं, लेकिन स्तनपान कराने वाली माताओं को पर्याप्त पानी और तरल पदार्थ लेना बेहद जरूरी है।
  • आराम और नींद : नवजात की देखभाल में माँ की नींद प्रभावित होती है। डॉ. तोमर बताते हैं कि जब बच्चा सो रहा हो, माँ को भी छोटे-छोटे अंतराल में आराम करना चाहिए।
  • संक्रमण से बचाव : पूजा या सार्वजनिक कार्यक्रमों में जाते समय माँ को मास्क का प्रयोग करने और भीड़ से दूरी बनाए रखने की सलाह दी गई है।

3. धार्मिक आस्थाओं के बीच स्वास्थ्य संतुलन

डॉ. तोमर का कहना है कि धार्मिक आस्था और स्वास्थ्य दोनों का संतुलन बनाए रखना ही सही है। यदि माँ की तबीयत कमजोर है या डॉक्टर ने आराम की सलाह दी है, तो उन्हें पूर्ण उपवास करने की बजाय सात्विक फलाहार अपनाना चाहिए। इससे धार्मिक भावना भी बनी रहती है और स्वास्थ्य पर भी विपरीत असर नहीं पड़ता।


4. परिवार की भूमिका

डॉ. तोमर इस बात पर जोर देते हैं कि नवजात और उसकी माँ की देखभाल सिर्फ महिला की जिम्मेदारी नहीं है। पति, सास-ससुर और परिवार के अन्य सदस्य भी सहयोग करें। घर का वातावरण शांत और सकारात्मक हो तो शिशु का मानसिक और शारीरिक विकास भी बेहतर होता है।


5. डॉक्टर का संदेश

“नवरात्र ऊर्जा और नई शुरुआत का पर्व है। नवजात शिशु और उसकी माँ वास्तव में परिवार के लिए नई ऊर्जा का स्रोत होते हैं। इनकी देखभाल पूजा-पाठ से कम नहीं है। अगर हम सही पोषण, स्वच्छता और समय पर आराम सुनिश्चित करें तो यह माँ और शिशु दोनों के लिए शुभ समय सिद्ध होगा।” – डॉ. अभिनव तोमर


नवरात्रों में माताओं और नवजात शिशुओं की देखभाल आस्था और स्वास्थ्य दोनों का संतुलन है। यदि माताएँ डॉ. तोमर के बताए इन छोटे-छोटे उपायों को अपनाएँ तो वे बिना किसी कठिनाई के त्योहार की पवित्रता और शिशु की देखभाल दोनों को साथ निभा सकती हैं।

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