बागपत

बागपत का आठवाँ अजूबा : 60 फीट की छलाँग और फिर मौत के मुंह से वापसी

नेशनल प्रेस टाइम्स, ब्यूरो

बागपत : यह कहानी किसी फिल्मी पटकथा से कम नहीं। 18 अगस्त 2024 को अस्पताल की पाँचवीं मंज़िल से 60 फीट की ऊँचाई से छलाँग लगाने वाले युवक को डॉक्टरों ने बचने की कोई उम्मीद नहीं दी थी। लेकिन किस्मत ने उसका साथ दिया, और आज वह मौत को मात देकर जीवन का पैग़ाम सुनाने के लिए हमारे सामने बैठा है।


विशेष साक्षात्कार

प्रश्न 1 : उस दिन क्या हुआ था जब आपने 60 फीट से छलांग लगा दी?
उत्तर : सच कहूँ तो उस पल मैं पूरी तरह निराश था। मेरा दर्द 1 अप्रैल 2022 से शुरू हुआ। पहले लगा सामान्य बुख़ार और सिरदर्द है, लेकिन एक-एक कर रिपोर्ट्स ने नई-नई बीमारियाँ सामने रखीं। नवंबर 2022 में टीबी कन्फर्म हुई। 9 महीने इलाज चला, लेकिन ठीक होते-होते MDR-TB की रिपोर्ट आ गई। हिम्मत टूट चुकी थी।

16 अगस्त 2024 को अस्पताल में भर्ती था और 18 अगस्त को मैंने छलाँग लगा दी। पाँचवीं मंज़िल पर खिड़की तक पहुँचने के लिए स्टूल और अन्य उपकरणों का सहारा लेना पड़ा, जबकि डॉक्टरों के मुताबिक उस समय मुझे बाथरूम तक जाने के लिए भी सहारे की ज़रूरत थी। मैंने आँखें बंद कीं और कूद गया — लगा सब खत्म हो जाएगा।


प्रश्न 2 : लेकिन आप तो आज हमारे सामने बैठे हैं… उस वक्त अस्पताल में क्या हालात थे?
उत्तर : डॉक्टरों ने कई दिनों तक मेरे मरने का इंतज़ार किया। मेरी 12 हड्डियाँ टूट चुकी थीं। कई ऑपरेशन हुए। आईसीयू की मशीनों की आवाज़ें, मॉनिटर की लाल बत्तियाँ और चारों ओर की खामोशी — यह सब मानो मौत का सन्नाटा था। लेकिन उसी सन्नाटे से नई ज़िंदगी ने जन्म लिया।


प्रश्न 3 : उस कठिन दौर में आपको सबसे बड़ा सहारा किससे मिला?
उत्तर : सबसे बड़ा सहारा मुझे परिवार और दोस्तों से मिला। माँ, छोटा भाई शिवराज और पूरा परिवार दिन-रात साथ खड़ा रहा। मेरे सच्चे दोस्त विनय और वशु ने कभी मेरा साथ नहीं छोड़ा।

और सबसे अहम — एक्टर विकास मलानिया और उनके साथी। उन्होंने हर तरह से मेरा सहयोग किया, मुझे टूटने नहीं दिया। उनकी मौजूदगी मेरे लिए अनमोल थी।


प्रश्न 4 : अपने डॉक्टरों और मेडिकल टीम के बारे में आप क्या कहना चाहेंगे?
उत्तर : डॉ. राहुल कश्यप, डॉ. स्तुति शुक्ला कश्यप और डॉ. हैदर मेरे लिए भगवान से कम नहीं हैं। उन्होंने सिर्फ़ इलाज नहीं किया, बल्कि मुझे जीने का विश्वास दिया। उनकी मेहनत और समर्पण ने मेरी साँसों की डोर टूटने नहीं दी।


प्रश्न 5 : और आपकी पत्नी?
उत्तर : मेरी पत्नी नीतू मेरी सबसे बड़ी ताक़त बनीं। उन्होंने हर आँसू अपने आँचल में समेट लिया। जब मैं हार मान चुका था, तब उन्होंने मेरा हाथ थामे रखा। सच कहूँ तो अगर वो न होतीं तो मैं आज आपके सामने नहीं बैठा होता।


प्रश्न 6 : आज जब आप पीछे मुड़कर देखते हैं तो क्या महसूस करते हैं?
उत्तर : आज महसूस करता हूँ कि ज़िंदगी कितनी कीमती है। मौत ने मुझे छूकर वापस भेजा है। शायद इसलिए कि मैं लोगों तक यह संदेश पहुँचा सकूँ — उम्मीद कभी मत छोड़ो।

यह साक्षात्कार केवल एक मरीज की आपबीती नहीं, बल्कि इंसानी जज़्बे, परिवारिक प्रेम और सहयोग की अनोखी गवाही है। पाँचवीं मंज़िल की खिड़की से छलाँग मौत की ओर उठाया कदम था, लेकिन उससे ऊपर उठकर जो जीवन वापस मिला — वह वास्तव में बागपत का आठवाँ अजूबा है।

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