सिंगरौली

सिंगरौली में प्रशासनिक निष्पक्षता पर उठे सवाल 

जातिगत मानसिकता से चल रहा विभागीय कामकाज!

नेशनल प्रेस टाइम्स, ब्यूरो।
सिंगरौली। मध्य प्रदेश का ऊर्जा नगरी कहा जाने वाला सिंगरौली आज एक नई बहस के केंद्र में है। जिले के प्रशासनिक और पुलिस तंत्र पर जातिगत मानसिकता से काम करने के आरोप गंभीर होते जा रहे हैं। सूत्रों के अनुसार, जिले में कई विभागों में एससी, एसटी और ओबीसी बनाम सामान्य वर्ग की सोच गहराई तक पैठ बना चुकी है।
जनरल वर्ग के खिलाफ तत्काल कार्रवाई, अन्य पर जांच का हवाला
स्थानीय नागरिकों और कई सामाजिक संगठनों का कहना है कि पुलिस विभाग में शिकायत दर्ज होने के बाद कार्रवाई का तरीका शिकायतकर्ता और आरोपी की जातिगत पृष्ठभूमि देखकर बदल जाता है।
अगर शिकायत किसी जनरल वर्ग के व्यक्ति के खिलाफ होती है, तो तुरंत एफआईआर दर्ज कर दी जाती है, चाहे आरोप प्रारंभिक स्तर पर ही क्यों न हों।लेकिन जब वही शिकायत किसी एससी, एसटी या ओबीसी वर्ग के व्यक्ति के खिलाफ होती है, तो पहले “जांच की आवश्यकता” बताकर मामला लंबे समय तक लटकाया जाता है।
 कई गंभीर मामले वर्षों से लंबित
जिले के अंदरूनी सूत्रों का दावा है कि कई गंभीर और संवेदनशील मामले वर्षों से पेंडिंग हैं। वहीं कुछ मामूली शिकायतों पर अधिकारी खुद संज्ञान लेकर त्वरित कार्रवाई कर देते हैं। इस असमानता के कारण प्रशासनिक विश्वसनीयता पर सवाल उठ रहे हैं।
कई कर्मचारियों का कहना है कि अगर शिकायत किसी जनरल वर्ग के अधिकारी के खिलाफ होती है, तो उस पर दबाव बनाकर निलंबन या कार्रवाई कर दी जाती है। परंतु अगर वही गलती किसी अन्य वर्ग के व्यक्ति से होती है, तो फाइलें महीनों तक बिना निर्णय के पड़ी रहती हैं।
अंदरूनी खींचतान से प्रभावित विभागीय माहौल
विभागीय सूत्रों का कहना है कि ऐसी सोच से विभागीय माहौल भी प्रभावित हो रहा है।
कुछ अधिकारी अपने अधीनस्थ कर्मचारियों पर जाति आधारित रुझान के कारण अनुचित दबाव बनाते हैं। इससे न केवल कामकाज प्रभावित हो रहा है, बल्कि कई कर्मचारी मानसिक तनाव का भी सामना कर रहे हैं।
स्थानीय नेताओं और सामाजिक संगठनों की प्रतिक्रिया
कई राजनीतिक नेताओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने इस स्थिति पर चिंता जताई है। उनका कहना है कि सिंगरौली में यह प्रवृत्ति धीरे-धीरे “जाति आधारित प्रशासन” में बदलती जा रही है, जो समाज के लिए खतरनाक संकेत है।
एक सामाजिक संगठन के सदस्य ने कहा —
“अपराध कोई जाति नहीं करता, अपराध व्यक्ति करता है। परंतु अगर अधिकारी जाति देखकर निर्णय लेंगे, तो न तो न्याय होगा और न ही कानून का सम्मान।”
 पुलिस और प्रशासन की भूमिका पर उठे सवाल
पुलिस की भूमिका को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। आरोप है कि अगर आरोपी सामान्य परिवार से है और उसके पास राजनीतिक या आर्थिक ताकत नहीं, तो उसे तुरंत गिरफ्तार कर लिया जाता है।
लेकिन यदि आरोपी किसी राजनीतिक दल, प्रभावशाली व्यक्ति या पैसे वाले वर्ग से जुड़ा है, तो कार्रवाई धीमी पड़ जाती है या मामला दबा दिया जाता है।
 सामाजिक ताने-बाने पर असर
इस जातिवादी मानसिकता के कारण समाज में विभाजन और अविश्वास का माहौल बढ़ रहा है। लोग प्रशासन पर भरोसा खोने लगे हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि यह प्रवृत्ति सामाजिक सौहार्द और कानून के समान व्यवहार की भावना को कमजोर कर रही है, जिससे अपराध भी अप्रत्यक्ष रूप से बढ़ रहे हैं। सिंगरौली के हालात यह संकेत दे रहे हैं कि यदि विभागों में निष्पक्षता और समानता को स्थापित नहीं किया गया, तो आने वाले समय में प्रशासनिक ढांचा और जनविश्वास दोनों कमजोर होंगे।
जनता और सामाजिक संगठनों ने मांग की है कि सरकार ऐसे आरोपों की उच्चस्तरीय जांच कराए और सुनिश्चित करे कि भविष्य में किसी भी विभाग में जातिगत मानसिकता के बजाय न्याय और योग्यता के आधार पर कार्रवाई हो।
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