गोड्डा
माता पिता के आदेश का पालन करने वाले पुत्र का कभी अनिष्ट नहीं होता : रविशंकर

नेशनल प्रेस टाइम्स, ब्यूरो
पथरगामा। पथरगामा दुर्गा मंदिर परिसर में आयोजित नौदिवसीय श्रीराम कथा के सातवें दिन कथा वाचक पंडित रविशंकर ठाकुर जी महाराज ने अपनी दिव्य वाणी से उपस्थित श्रद्धालुओं को मंत्रमुग्ध कर दिया। उन्होंने कहा कि “जो पुत्र बिना विचारे अपने माता-पिता के आदेश का पालन करता है, उसका कभी अनिष्ट नहीं हो सकता।” यह शास्त्रों का अटल सिद्धांत है। उन्होंने कहा कि जब भी कोई अतिथि घर आए, तो पहले उसका जलपान कराना चाहिए, फिर कारण पूछना चाहिए। उन्होंने दोहा उद्धृत करते हुए कहा—
“रघुकुल रीत सदा चली आई,
प्राण जाई पर वचन न जाई।”
अर्थात रघुकुल की परंपरा रही है कि एक बार दिया गया वचन किसी भी परिस्थिति में वापस नहीं होता। बताया कि बड़े पद के साथ बड़ी जिम्मेदारियाँ भी जुड़ी होती हैं। आचार्य वशिष्ठ ने राम की जन्मकुंडली देखकर ही कहा था कि राम स्वयं सत्य हैं और सत्य ही राम है। इसलिए जीवन में समय-समय पर सत्संग अवश्य करना चाहिए। उन्होंने कहा कि राम का नाम कलियुग में एकमात्र सहारा है, चाहे जानकर लिया जाए या अनजाने में, यह हमेशा मंगलकारी ही होता है।
हनुमान जी का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि राजा से संवाद कैसे स्थापित करना है, यह हनुमान से सीखना चाहिए। उन्होंने बताया कि अभिमान बहुत सूक्ष्म होता है, कब मन में प्रवेश कर जाए, कहा नहीं जा सकता। जिस दिन अभिमान आ जाता है, उसी दिन से पतन की शुरुआत हो जाती है।
हनुमान जी कूटनीति, विनम्रता और सेवा के अद्भुत प्रतीक हैं—उनके चरित्र से राजनीति और नीति-शास्त्र दोनों सीखे जा सकते हैं। उन्होंने कहा कि रावण का नामकरण स्वयं भगवान शिव ने किया था, पहले उसका नाम दशानन था। उन्होंने समझाया कि यदि घर में पिता की तबीयत खराब हो, तो कथा में आने से अधिक पुण्य घर रहकर उनकी सेवा करने में है। उन्होंने कहा कि जो पिता सौभाग्य से ऐसे पुत्र को पाता है जो उसके आदेश का पालन करे, वह वास्तव में धन्य है। उन्होंने माता-पिता के महत्व पर विशेष जोर देते हुए कहा कि
बच्चों को इतना शिक्षित होना चाहिए कि वे संस्कार न भूलें।
माता-पिता के चरणों में झुकना विनम्रता की पहली सीढ़ी है।
जो पुत्र हर छोटे-बड़े कार्य में पिता से सलाह लेता है, उसे कभी किसी और समझाने की आवश्यकता नहीं पड़ती। कथा के दौरान बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे और पूरा वातावरण राम नाम से गुंजायमान हो उठा।




