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“यह सिर्फ एक स्कूल नहीं… मेरी जिंदगी की तपस्या है”

नेशनल प्रेस टाइम्स, ब्यूरो
जैन गली नं. 03, अजीतनाथ मंदिर के सामने स्थित JSV किड्स एकेडमी आज जहां सफलताओं की ऊँचाइयों पर खड़ी है, वहां पहुंचना आसान नहीं था। इस एकेडमी की संचालिका मीता अरोरा की आँखों में संघर्ष की चमक और उपलब्धि का सुकून साफ देखा जा सकता है। इंटरव्यू की शुरुआत ही उनकी भावुक आवाज से होती है—
“जब मैंने कदम बढ़ाया, तो लोग हंसे भी… और डरे भी।”
मीता अरोरा बताती हैं
“साल 2009… दिसंबर का महीना… ठंड बहुत थी, लेकिन मेरे मन में जलती उम्मीद की आग उससे ज्यादा गर्म थी। उस दिन जब पहला रजिस्ट्रेशन हाथ में आया, तो मेरी आंखों में आंसू थे। लगा जैसे कोई बच्चा पहली बार चलना सीख गया हो—जबकि वह बच्चा मेरी एकेडमी थी।”
उनका स्वर धीमा पड़ जाता है।
वह याद करती हैं कि शुरुआती दिनों में न लोग समझते थे, न सहयोग मिलता था।
“लोग कहते थे, ‘अरे! बड़ौत में किड्स प्ले एकेडमी? कौन भेजेगा इतना छोटे बच्चों को!’
पर मेरे भीतर एक आवाज थी—‘अगर मैं कोशिश नहीं करूँगी, तो बदलाव कैसे आएगा?’”
“कई दिन ऐसे आए जब लगा कि बस… अब नहीं हो पाएगा।”
मीता अरोरा बताती हैं
**“हमने कमरे किराए पर लिए थे, जितने पैसे बचते, उससे बच्चों के लिए रंग, कॉपी, टॉय, चार्ट पेपर लाती थी।
कभी फीस देर से आती, कभी बिल्कुल नहीं आती।
कभी बिजली का बिल देना मुश्किल हो जाता,
तो कभी स्टाफ की सैलरी देनी भारी पड़ती थी।
पर मैं रोज अपनी डायरी खोलकर खुद से एक ही बात कहती—
‘मीता, एक दिन यही संघर्ष तुम्हारा गौरव बनेगा।’”**
“हर छोटा बच्चा मेरा सपना था… हर मुस्कान मेरी कमाई।”
भावुक होते हुए मीता कहती हैं—
“जब पहली बार दस बच्चे आए तो लगा मानो दुनिया मिल गई हो।
मैं बच्चों को गले लगाकर पढ़ाती थी…
कभी-कभी तो घर से खिलौने ले आती कि कहीं बच्चे उदास न हों।”
वह मुस्कुराकर कहती हैं—
“आज भी जब कोई बच्चा ‘मैम…’ कहकर हाथ पकड़ लेता है, तो लगता है भगवान ने मुझे सबसे बड़ा सम्मान दे दिया।”
“आज 200 बच्चे और 25 शिक्षिकाएँ… यह संख्या नहीं, मेरा परिवार है।”
गर्व से उनकी आंखें चमक जाती हैं—
“मेरी एकेडमी में आज लगभग 200 बच्चे हैं।
25 शिक्षिकाएँ हैं—जो इस संस्था को प्यार और विश्वास से सींच रही हैं।
ये महिलाएँ सिर्फ टीचर नहीं, मेरे सफर की साथी हैं।
इनके बिना JSV आज यह मुकाम कभी नहीं पा सकता था।”
“यह एकेडमी मेरे खून-पसीने से तैयार हुई है… और यह सफर अभी जारी है।”
मीता कहती हैं—
**“JSV मेरे लिए नौकरी नहीं, यह मेरी तपस्या है।
मैंने इसे ईंट-ईंट जोड़कर बनाया है।
किसी माँ की तरह इसे बढ़ते देखा है।
आज जब लोग कहते हैं कि ‘JSV जनपद की नं. 1 एकेडमी है’,
तो मुझे लगता है कि मेरे संघर्ष की हर रात सार्थक हो गई।”**
“भविष्य? बस इतना चाहती हूँ कि बड़ौत के बच्चे भी सपने देखें… और उन्हें पूरा कर सकें।”
वह अंत में कहती हैं
“मैं चाहती हूँ कि ये बच्चे आगे चलकर आत्मविश्वासी बनें, संस्कारवान बनें और दुनिया में अपना नाम करें।
अगर मेरी एकेडमी उन्हें थोड़ा सा भी भविष्य दे पाए… तो यही मेरी सबसे बड़ी जीत है।”
मीता अरोरा की यह भावनात्मक यात्रा बताती है कि सच्‍चा समर्पण किसी भी साधारण शुरुआत को असाधारण बना सकता है।
JSV किड्स एकेडमी आज जिस ऊँचाई पर है, वह मीता के संघर्ष, साहस और मातृत्वपूर्ण सेवाभाव की जीत है।
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