सिंगरौली
किलर रोड पर फिर मौत! प्रशासन सोया है या सुला दिया गया है ?
तेज़ रफ़्तार टैंकर ने 10 साल के बच्चे की जान ली, सिंगरौली की सड़कों पर मौत का नंगा नाच जारी

नेशनल प्रेस टाइम्स, ब्यूरो।
सिंगरौली। जिस जिले को ऊर्जा की राजधानी कहा जाता है, वही आज मौत का शहर बन चुका है। परसौना–बरगवां रोड के नौगाई स्थित चमेली मोड़ पर शुक्रवार की दोपहर 10 साल के मासूम की सड़क पर ही मौत हो गई। तेज़ रफ्तार टैंकर ने बच्चे के सिर पर वाहन चढ़ा दिया। पलभर में एक परिवार का चिराग बुझ गया—और सिंगरौली की ‘किलर रोड’ ने एक और बलि ले ली। हादसे के बाद ग्रामीण और राहगीर उबल पड़े। मुख्य सड़क पर चक्का जाम कर दिया गया। दोनों तरफ वाहनों की लंबी कतारें लगी है,तनाव का माहौल है और भारी पुलिस बल की तैनाती भी है। पूरा इलाके में सनसनी व्यप्त है प्रदर्शनकारी एक ही बात कह रहे हैं कि आखिर कब तक और कितने लोग मरेंगे? कब जागेगा प्रशासन?? ख़बर लिखे जाने तक स्थानीय लोगों का प्रदर्शन जारी रहा।
प्रशासन के खिलाफ गुस्सा काबू से बाहर
मृतक के परिजन सदमे में हैं, गाँव में मातम पसरा है, और दूसरी ओर जनता प्रशासन की ढीली पकड़ पर सवाल उठा रही है। स्थानीय लोगों का आरोप साफ़ है कि सड़क सुरक्षा के लिए कोई ठोस योजना अब तक नहीं बन पाई है। भारी वाहनों की रफ्तार पर कोई नियंत्रण नहीं है। कोल ट्रांसपोर्ट करने वाले हाइवा–ट्रेलर का खुलेआम आतंक आए दिन दुर्घटनाओं के रूप में दिखाई देता रहता है। सड़क पर खड़े वाहन मौत को दावत देते हैं, लेकिन कार्रवाई शून्य ही रहती है। लोगों की मांग बिल्कुल स्पष्ट है कि भारी वाहनों के लिए अलग सड़क बनाओ, नहीं तो मौतें रोक पाना नामुमकिन है।
क्या प्रशासन के पास सड़क सुरक्षा का कोई ब्लूप्रिंट है !
यह सबसे बड़ा सवाल है कि क्या जिला प्रशासन के पास सच में सड़क सुरक्षा की कोई भी रणनीति है भी की नहीं है। न स्पीड कंट्रोल,न मॉनिटरिंग,न पार्किंग कंट्रोल,न चालान और न जिम्मेदार अधिकारियों पर कोई कार्रवाई। सिंगरौली की सड़कें खतरनाक क्यों हो गई हैं इसका जवाब भी प्रशासन के पास नहीं है।
हादसों का इतिहास डराता है, लेकिन प्रशासन को फर्क नहीं पड़ता
किलर रोड पर दर्जनों मौतें हो चुकी हैं। फिर भी न कंपनी जागी, न प्रशासन। सिंगल लेन सड़कों पर कोल ट्रांसपोर्ट के ट्रेलर और हाइवा कतार में खड़े रहते हैं। इनकी वजह से सामने से आती गाड़ियों को रास्ता नहीं मिलता,सड़कें संकरी हो जाती हैं। ओवरटेक में अनियंत्रित टक्करें बढ़ती हैं लोग रोज़ जान गंवा रहे हैं। फिर भी जिम्मेदार विभाग कान में तेल डाले बैठे हैं।
प्रशासन और कंपनियों का ‘मौन’ ही सबसे बड़ा सवाल
अब तो लोग पूंछने लगे हैं कि आखिर किसके दबाव में कार्रवाई नहीं होती? क्यों बड़े वाहनों पर रोक नहीं लगाई जाती? क्यों भारी वाहनों की स्पीड सीमा लागू नहीं होती? क्यों सड़कें चौड़ी नहीं की जातीं? क्यों बच्चों की जान का कोई मोल नहीं? इस क्यों का प्रशासन के पास कोई जवाब नहीं। यह हादसा सिर्फ एक दुर्घटना नहीं, बल्कि व्यवस्था की असफलता का प्रमाण है। हर मौत, हर हादसा, हर प्रदर्शन—सिंगरौली की प्रशासनिक लापरवाही पर एक और शिकंजा कसता है। अगर प्रशासन अभी भी नहीं जगा तो आने वाले दिनों में ये सवाल और तीखे होंगे और मौतों का यह सिलसिला और लंबा होता चला जाएगा।




