गाजियाबाद
लोनी का “सुपर मॉडर्न” शौचालय
जहाँ स्वच्छ भारत मिशन और मिशन शक्ति दोनों की इज्ज़त एक साथ साफ़ हो रही है

नेशनल प्रेस टाइम्स, ब्यूरो
लोनी : रामलीला मैदान में बना नगर पालिका परिषद लोनी का सार्वजनिक शौचालय किसी “नए भारत” की नहीं बल्कि “लापरवाही और शर्मनाक व्यवस्थाओं” की चमकदार मिसाल बन गया है।
यहाँ पर तैनात कर्मचारी ने मानो “जेंडर इक्वालिटी” को गलत तरीके से समझ लिया हो — क्योंकि यहाँ महिला और पुरुष दोनों को एक ही शौचालय में प्रवेश करने की खुली सुविधा दी जा रही है।
हाँ, आप सही समझे — यह कोई फैसिलिटी नहीं, बल्कि फूहड़ता की सरकारी गारंटी हैं
स्वच्छ भारत मिशन: पोस्टर चमकते हैं, शौचालय शर्माते हैं
जर्जर दीवारों, टूटे दरवाज़ों और बुरी दुर्गंध के बीच यह शौचालय किसी सरकारी योजना से कम और किसी हॉरर शो की शूटिंग लोकेशन ज्यादा लगता है।
बाहर बड़े-बड़े स्लोगन लिखे हैं
> “स्वच्छता ही सेवा है”
जबकि अंदर जाने वाले लोग पूछ रहे हैं —
“सेवा किसकी और सुरक्षा किसकी
महिला सुरक्षा? अरे वो तो सिर्फ बैनर में मिलती है
कर्मचारी के मुताबिक,
> “शौचालय में जाकर लड़का हो या लड़की — सब एक ही रास्ता इस्तेमाल करेंगे, नियम तो कौन देखने आया है? पैसा दो और अंदर जाओ।”
शायद कर्मचारी को लगता है कि बजट कम होने से शौचालय यूनिसेक्स बन गया है, लेकिन असलियत यह है कि इससे महिलाओं की गोपनीयता और सुरक्षा दोनों खतरे में हैं।
अगर मिशन शक्ति को कहीं से यह दृश्य दिख जाए, तो शायद अभियान खुद ही बेहोश होकर गिर पड़े।
रेस्मी वसूली, अनौपचारिक फीस — नाम: सुविधा शुल्क
शौचालय उपयोग करने वालों को ऐसा महसूस होता है जैसे वे किसी VIP सेवक से एंट्री टिकट खरीद रहे हों।
न नियम, न रसीद — बस मनमाना शुल्क और कर्मचारी की जेब में सीधी एंट्री।
सतबीर गोस्वामी का आरोप है कि कई बार शिकायत करने के बाद भी प्रशासन इस विषय पर उतना ही शांत है, जितना बजट वाले दिन नेताओं का चेहरा टीवी कैमरे देखते समय होता है।
नगर पालिका प्रशासन: ‘हम देख रहे हैं’ मोड ON
नगरपालिका की भूमिका इस मुद्दे में काफी “दूरदर्शी” है —
क्योंकि दूर से सब देख रहे हैं,
और शायद पास आने का इरादा भी नहीं है।
कई नागरिकों ने शिकायतें भी भेजी, पर लगता है फाइलें प्रशासन के किसी “कागज़ी कब्रिस्तान” में दफन हो चुकी हैं।
निष्कर्ष: यह शौचालय नहीं, सरकारी लापरवाही की लाइव प्रदर्शनी है
जिस जगह स्वच्छता, सुरक्षा और सम्मान की उम्मीद होती है, वहाँ आज: गोपनीयता टूटी है सुरक्षा मजाक बन रही है नियम केयर टेकर की कुर्सी के नीचे दबे पड़े हुए हैं और जिम्मेदार अधिकारी चैन की नींद सो रहे हैं
अगर ऐसे ही स्वच्छ भारत मिशन और मिशन शक्ति लागू होते रहे, तो आने वाले समय में शौचालयों का नाम बदलकर “संवेधानिक शर्मगृह” रखना पड़ेगा।
सेक्युलर इंकलाब पार्टी के प्रमोद गोस्वामी की अपील:
> “ज्यादा कुछ नहीं चाहिए — बस शौचालय शौचालय की तरह चले, मेला बनकर नहीं।”


