
नेशनल प्रेस टाइम्स, ब्यूरो।
लोनी गाजियाबाद : गाजियाबाद जनपद का लोनी क्षेत्र एक बार फिर चर्चाओं के केंद्र में है, लेकिन इस बार चर्चा में आने की वजह कोई विकास कार्य नहीं बल्कि एक वायरल वीडियो है, जिसने प्रशासनिक संवेदनशीलता की पोल खोलकर रख दी है। शीतलहर और कड़ाके की ठंड से बचाव के लिए खोले गए शेल्टर होम,रैन बसेरा का निरीक्षण करने निकले उपजिलाधिकारी लोनी दीपक सिंघनवाल उस समय सुर्खियों में आ गए, जब सड़क पर ठंड से ठिठुर रहे एक व्यक्ति को शेल्टर होम रैन बसेरा ले जाते हुए उनका वीडियो बनाया गया—वह भी उस व्यक्ति की साफ मना करने के बावजूद।
वीडियो में साफ सुना जा सकता है कि ठंड से परेशान व्यक्ति कह रहा है कि वह अपना वीडियो नहीं बनवाना चाहता। इसके बावजूद मोबाइल कैमरा चलता रहा। सवाल यह नहीं है कि किसी जरूरतमंद को शेल्टर होम ले जाना गलत है, सवाल यह है कि क्या मदद अब बिना कैमरे के संभव नहीं रही? क्या संवेदना अब ‘रिकॉर्ड’ होने के बाद ही मान्य होती है?
स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि वाकई उद्देश्य मानवीय होता, तो वीडियो बनाने की ज़रूरत ही नहीं पड़ती। मदद चुपचाप भी की जा सकती थी। लेकिन आज के दौर में लगता है कि हर नेक काम के साथ एक कैमरा अनिवार्य हो गया है—ताकि “ऊपर तक संदेश जाए”, “अधिकारियों की नजर में नंबर बनें” और “वाही-वाही मिल सके”।
विडंबना यह रही कि वीडियो बनाने के बाद उपजिलाधिकारी की टीम में शामिल किसी व्यक्ति ने ही उसे वायरल कर दिया। इसके बाद सोशल मीडिया और व्हाट्सऐप ग्रुपों में प्रतिक्रियाओं की बाढ़ आ गई। लोग पूछ रहे हैं—अगर किसी अधिकारी को जरूरतमंद की मदद करने के लिए भी प्रचार का सहारा लेना पड़े, तो फिर असली सेवा और दिखावे में फर्क ही क्या रह गया?
कुछ लोग इसे ‘संवेदना का प्रदर्शन’ बता रहे हैं, तो कुछ इसे ‘नाम चमकाने की कवायद’। सवाल यह भी उठ रहा है कि क्या प्रशासन अब ज़मीनी हकीकत सुधारने से ज़्यादा इमेज बिल्डिंग में व्यस्त हो गया है? ठंड से जूझ रहे गरीब के लिए कंबल और छत ज्यादा जरूरी है या फिर किसी अफसर के मोबाइल कैमरे में कैद होना?
उपजिलाधिकारी लोनी की मंशा चाहे जो भी रही हो, लेकिन यह घटना एक बड़ा सवाल छोड़ जाती है—आखिरकार संवेदना को केवल नाम कमाने का जरिया क्यों बना दिया गया है? क्या मानवता अब तभी जागती है जब उसके साथ एक वीडियो, एक पोस्ट और कुछ लाइक्स जुड़े हों?
आज लोनी की सड़क पर ठंड से कांपता वह व्यक्ति नहीं, बल्कि व्यवस्था की संवेदनहीनता ठिठुरती हुई नजर आ रही है। और जनता? वह इस तमाशे को देखकर चुटकियां लेने को मजबूर है—क्योंकि जब मदद भी प्रचार बन जाए, तो भरोसा अपने आप डगमगा जाता है।


