बागपत
“राजनीति मेरे लिए पद नहीं, सेवा का माध्यम है” — सुधीर मान

नेशनल प्रेस टाइम्स, ब्यूरो।
बागपत। राजनीति अक्सर सत्ता और स्वार्थ के आरोपों से घिरी रहती है, लेकिन कुछ चेहरे ऐसे भी होते हैं जो राजनीति को सेवा, संस्कार और समर्पण का मार्ग मानते हैं। सुधीर मान ऐसे ही व्यक्तित्व हैं—जिनकी राजनीति की यात्रा केवल चुनावी पड़ावों तक सीमित नहीं, बल्कि समाज और राष्ट्र के प्रति एक भावनात्मक संकल्प है।
प्रश्न: राजनीति में आने का विचार कब और कैसे आया?
सुधीर मान शांत स्वर में कहते हैं—
“राजनीति मेरे लिए अचानक लिया गया फैसला नहीं थी। समाज में रहते हुए जब अन्याय, असमानता और युवाओं की दिशाहीनता देखी, तभी मन में विचार आया कि केवल आलोचना से कुछ नहीं बदलेगा, मैदान में उतरना होगा।”
उनकी राजनीतिक यात्रा की शुरुआत शिवसेना से हुई। वहाँ उन्होंने संगठन, अनुशासन और जमीनी संघर्ष को नजदीक से समझा। आगे चलकर वे भारतीय जनता पार्टी से जुड़े और भाजपा युवा मोर्चा के अध्यक्ष बने। युवाओं के बीच उनकी सक्रियता, स्पष्ट विचारधारा और कर्मठता ने उन्हें जल्द ही पहचान दिलाई। बाद में पार्टी ने उन्हें क्षेत्रीय उपाध्यक्ष की जिम्मेदारी सौंपी।
प्रश्न: आपकी राजनीति की मूल विचारधारा क्या है?
सुधीर मान बिना किसी दिखावे के कहते हैं—
“मैं हिंदुत्व को नारे के रूप में नहीं, संस्कार के रूप में जीता हूँ। राष्ट्र पहले, समाज साथ में और व्यक्ति अंत में—यही मेरी सोच है।”
उनकी राजनीति में सबसे गहरा प्रभाव उनके राजनीतिक गुरु डॉ. सत्यपाल सिंह, पूर्व सांसद, का रहा है।
वे भावुक होकर कहते हैं—
“डॉ. सत्यपाल सिंह जी ने मुझे सिखाया कि राजनीति में सबसे कठिन काम सत्ता पाना नहीं, बल्कि सत्ता में रहकर भी ईमानदार बने रहना है।”
प्रश्न: आज आप खुद को किस रूप में देखते हैं—राजनेता या समाजसेवक?
इस सवाल पर उनके शब्द और भी भावुक हो जाते हैं—
“मैं अब खुद को केवल एक राजनेता नहीं मानता। मैं अपने देश और समाज की सेवा में विश्वास रखता हूँ। राजनीति मेरे लिए साधन है, साध्य नहीं।”
आज वे नगरवासियों के बीच पूरी निष्ठा और समर्पण भाव से कार्य कर रहे हैं। चाहे सामाजिक समस्याएँ हों, युवाओं का मार्गदर्शन हो या आम नागरिक की पीड़ा—सुधीर मान हर मुद्दे को व्यक्तिगत जिम्मेदारी मानते हैं।
प्रश्न: आपकी सबसे बड़ी इच्छा क्या है?
कुछ क्षण मौन रहकर वे कहते हैं—
“मेरी इच्छा बस इतनी है कि जब मैं इस दुनिया में न रहूँ, तब भी लोग मुझे याद करें—किसी पद के लिए नहीं, बल्कि एक ऐसे इंसान के रूप में जिसने समाज के लिए ईमानदारी से कुछ करने की कोशिश की।”
उनकी आँखों में उस पल राजनीति नहीं, बल्कि एक सच्चे सेवक की संवेदना दिखाई देती है।
सुधीर मान की यह यात्रा हमें याद दिलाती है कि राजनीति अगर सही हाथों में हो, तो वह सत्ता का नहीं, सेवा और संस्कार का सबसे मजबूत माध्यम बन सकती है।



