लखनऊ

यूपी विधानसभा सत्र के बीच ब्राह्मण विधायकों का ‘सहभोज’

एकजुटता का संदेश या सियासी संकेत?

नेशनल प्रेस टाइम्स, ब्यूरो।

लखनऊ : उत्तर प्रदेश विधानसभा के शीतकालीन सत्र के दौरान मंगलवार शाम को कुशीनगर से भाजपा विधायक पंचानंद पाठक (पीएन पाठक) के लखनऊ स्थित सरकारी आवास पर ब्राह्मण समुदाय के विधायकों और एमएलसी की एक महत्वपूर्ण बैठक हुई। इस आयोजन को ‘सहभोज’ का नाम दिया गया, जिसमें लिट्टी-चोखा और पारंपरिक भोजन परोसा गया। सूत्रों के अनुसार, इसमें करीब 40-50 ब्राह्मण विधायक और एमएलसी शामिल हुए, जिनमें ज्यादातर भाजपा के थे, हालांकि कुछ अन्य दलों के नेता भी मौजूद रहे।

बैठक की मुख्य बातें:
मेजबान पीएन पाठक ने इसे सामाजिक मिलन और सहभोज बताया, जिसमें कोई राजनीतिक एजेंडा नहीं था। उन्होंने कहा कि अगली बैठक में सभी जातियों के विधायक शामिल होंगे।
शामिल विधायकों जैसे रत्नाकर मिश्रा (मिर्जापुर), शलभमणि त्रिपाठी, एमएलसी उमेश द्विवेदी (मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के करीबी) और अन्य ने जोर दिया कि यह समाज की एकजुटता, संस्कार संरक्षण और आर्थिक रूप से कमजोर ब्राह्मणों की मदद के लिए था। चर्चा में ब्राह्मण समाज की राजनीतिक भूमिका, उत्पीड़न के मामलों में समर्थन, सामुदायिक फंड बनाने और समाज को एकजुट रखने जैसे मुद्दे उठे। बैठक में आर्थिक मदद का प्रस्ताव भी पारित हुआ, जैसे ब्राह्मण परिवारों में मौत या अन्याय की स्थिति में सहायता।

पृष्ठभूमि और सियासी चर्चाएं:
उत्तर प्रदेश की 403 सीटों वाली विधानसभा में वर्तमान में 52 ब्राह्मण विधायक हैं (जिनमें 46 भाजपा के)। हर आठवां विधायक ब्राह्मण होने के बावजूद पिछले 36 वर्षों से कोई ब्राह्मण मुख्यमंत्री नहीं बना है। इस बैठक ने सियासी गलियारों में हलचल मचा दी है: इसे ठाकुर विधायकों की पिछली ‘कुटुंब’ बैठक (मानसून सत्र में) के जवाब के रूप में देखा जा रहा है। विपक्ष, विशेष रूप से सपा नेता शिवपाल यादव ने भाजपा पर जाति बांटने का आरोप लगाते हुए ब्राह्मण विधायकों को सपा में आने का आमंत्रण दिया। कुछ सूत्र इसे सरकार में ब्राह्मणों की सुनवाई न होने की नाराजगी से जोड़ रहे हैं, जबकि आयोजक इसे पूरी तरह सामाजिक बता रहे हैं। अफवाहें हैं कि यह समाज के अधिकारों और सम्मान की मांग है, न कि सिर्फ मुख्यमंत्री पद की।

बैठक बंद कमरे में हुई, इसलिए विस्तृत विवरण सीमित हैं। विधायकों ने स्पष्ट किया कि यह कोई राजनीतिक मांग नहीं, बल्कि समाज की एकता का प्रयास है। जनवरी में अगली बैठक प्रस्तावित है, जिसमें व्यापक भागीदारी की उम्मीद है। यह आयोजन ठाकुर, कुर्मी और अन्य समुदायों की पिछली बैठकों की श्रृंखला में देखा जा रहा है, जो यूपी की जातिगत राजनीति को नई दिशा दे सकता है।

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