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क्या है मुंबई का भविष्य! ‘विकास की रफ्तार’ बनाम ‘राजनीतिक स्पीडब्रेकर’

मुबंई। अक्सर भारत की फाइनेंशियल कैपिटल कहे जाने वाले मुंबई में एक बार फिर डेवलपमेंट को लेकर पॉलिटिकल बहस छिड़ गई है, क्योंकि पार्टियां बृहन्मुंबई म्युनिसिपल कॉपोर्रेशन चुनावों की तैयारी कर रही हैं। मुंबई, जिसे भारत की आर्थिक धड़कन और सपनों की नगरी कहा जाता है, आज एक निर्णायक मोड़ पर खड़ी है। पिछले कुछ वर्षों का राजनीतिक घटनाक्रम यह साफ जाहिर करता है कि मुंबई की प्रगति सीधे तौर पर सत्ता की नीयत और नेतृत्व की कार्यक्षमता से जुड़ी है। अब एक बार फिर विकास के दावों और राजनीतिक बहसों के केंद्र में है। जैसे-जैसे बृहन्मुंबई नगर निगम के चुनाव नजदीक आ रहे हैं, राजनीतिक दल शहर के बुनियादी ढांचे को एक प्रमुख चुनावी हथियार के रूप में इस्तेमाल कर रहे हैं। सत्तारूढ़ महायुति गठबंधन के समर्थकों का तर्क है कि देवेंद्र फडणवीस के नेतृत्व वाली सरकारों में बड़े प्रोजेक्ट्स को अधिक गति मिली है। खबर विस्तार से पढ़ने के लिए वैबसाइट पर विजिट करें ।

उनका कहना है कि जब भी भाजपा-महायुति सत्ता में होती है, मुंबई अपनी पुरानी पहचान ‘दौड़ती मुंबई’ को सार्थक करती है। वहीं दूसरी तरफ महायुति के नेताओं के अनुसार: सड़कों, मेट्रो कॉरिडोर और कनेक्टिविटी प्रोजेक्ट्स में देरी का सीधा असर करोड़ों यात्रियों और व्यापार पर पड़ता है। उनका आरोप है कि पिछली सरकारों के दौरान विकास कार्यों में आई बाधाएं तकनीकी या वित्तीय नहीं, बल्कि राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता से प्रेरित थीं।
फडणवीस काल: मुंबई के इंफ्रास्ट्रक्चर का स्वर्ण युग-साल 2014 से 2019 के बीच देवेंद्र फडणवीस के नेतृत्व वाली सरकार ने मुंबई को आधुनिकता का नया चेहरा दिया। दशकों से फाइलों में दबे प्रोजेक्ट्स जैसे मुंबई मेट्रो नेटवर्क, कोस्टल रोड और अटल सेतु को ‘रॉकेट गति’ से जमीन पर उतारा गया। यह वह दौर था जब मुंबई ने वास्तव में वैश्विक स्तर के इंफ्रास्ट्रक्चर की ओर कदम बढ़ाए।
महाविकास अघाड़ी विकास पर ‘ब्रेक’ का दौर- 2019 में सत्ता परिवर्तन के बाद उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली सरकार पर विकास विरोधी होने के गंभीर आरोप लगे। राजनीतिक प्रतिशोध के चलते मेट्रो-3 के आरे कारशेड को रोकने जैसे फैसलों ने न केवल प्रोजेक्ट की लागत 10,000 करोड़ रुपये बढ़ा दी, बल्कि मुंबईकरों के सफर को भी चार साल पीछे धकेल दिया।
ठहराव की नीति: जल संरक्षण से लेकर मेट्रो तक, हर जनहितकारी कार्य पर ‘स्थगन’ (र३ं८) देना ही टश्अ की मुख्य नीति बन गई थी। जिस वक्त आम जनता ट्रैफिक और गड्ढों से जूझ रही थी, उस वक्त ‘मातोश्री’ से केवल प्रोजेक्ट्स में अड़ंगा डालने के निर्देश आ रहे थे।
महायुति की वापसी: फिर पटरी पर लौटी ‘विकास एक्सप्रेस’
2022 में एकनाथ शिंदे और देवेंद्र फडणवीस की महायुति सरकार ने सत्ता संभालते ही लंबित बाधाओं को दूर किया।
अटल सेतु: रिकॉर्ड समय में देश के सबसे लंबे समुद्री पुल को जनता के लिए खोला गया।
कोस्टल रोड: दक्षिण मुंबई से वर्ली का सफर अब मिनटों का रह गया है।
बुलेट ट्रेन और मेट्रो: जिस बुलेट ट्रेन को ‘अवांछित’ कहकर नकारा गया था, आज उस पर युद्धस्तर पर काम जारी है।
सावधान! क्या फिर लगेंगे ‘स्पीडब्रेकर’?
2024 के चुनावों में महायुति की सत्ता में वापसी ने विकास की उम्मीदों को नया पंख दिया है। हालांकि, चेतावनी अभी भी बरकरार है। यदि ‘स्पीडब्रेकर’ लगाने वाली प्रवृत्तियां—जो व्यक्तिगत अहंकार और कमीशनखोरी की राजनीति के लिए जानी जाती हैं—दोबारा हावी होती हैं, तो मुंबई का विकास फिर से 20 साल पीछे छूट सकता है।
निष्कर्ष: मुंबईवासियों के सामने आज एक स्पष्ट विकल्प है: तेज गति का आधुनिक विकास या प्रोजेक्ट्स को स्थगित करने वाला अहंकार? मुंबई की प्रगति को निर्बाध रखने के लिए ऐसी ‘स्पीडब्रेकर’ प्रवृत्तियों को स्थायी रूप से रोकना अनिवार्य है।

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