हापुड़

जी एस मेडिकल कॉलेज में आयोजित किया गया ब्लैकआउट मॉकड्रिल

नेशनल प्रेस टाइम्स , ब्यूरो

हापुड – नागरिक सुरक्षा एवं आपदा प्रबंधन की तैयारियों को परखने के उद्देश्य से जीएस मेडिकल कॉलेज में ब्लैकआउट मॉकड्रिल का आयोजन किया गया। इस अभ्यास का मुख्य उद्देश्य किसी भी आपात स्थिति , विशेषकर युद्धकालीन या प्राकृतिक आपदा के दौरान विद्युत आपूर्ति बाधित होने की स्थिति में अस्पताल की कार्यप्रणाली, सुरक्षा व्यवस्था तथा चिकित्सा सेवाओं की निरंतरता सुनिश्चित करना था।

निर्धारित समय पर पूरे परिसर में नियंत्रित रूप से बिजली आपूर्ति बंद की गई, जिसके बाद जनरेटर, यूपीएस एवं इमरजेंसी लाइटिंग सिस्टम को सक्रिय कर उनकी क्षमता और प्रतिक्रिया समय का परीक्षण किया गया। आईसीयू, ऑपरेशन थिएटर, इमरजेंसी वार्ड एवं ब्लड बैंक जैसे संवेदनशील विभागों में वैकल्पिक बिजली व्यवस्था की सुचारु कार्यशीलता को विशेष रूप से परखा गया।
मॉकड्रिल के दौरान मेडिकल स्टाफ, नर्सिंग स्टाफ, पैरामेडिकल कर्मियों, सुरक्षाकर्मियों तथा छात्रों को विभिन्न आपात भूमिकाएँ सौंपी गईं। मरीजों को सुरक्षित स्थानों पर स्थानांतरित करने, इमरजेंसी निकासी मार्गों के उपयोग, स्ट्रेचर एवं व्हीलचेयर की उपलब्धता, तथा अंधेरे में कार्य करने की क्षमता का अभ्यास कराया गया।
फायर सेफ्टी उपकरणों, संचार प्रणाली, कंट्रोल रूम, सायरन एवं पब्लिक एड्रेस सिस्टम की भी जांच की गई, ताकि आपातकाल में त्वरित सूचना प्रसारण और समन्वय में कोई बाधा न आए।

जिलाधिकारी अभिषेक पांडे के मार्गदर्शन में इस कार्यक्रम का आयोजन किया गया जिसमें उप नियंत्रक नागरिक सुरक्षा रेनू सिंह मौके पर मौजूद रहीं । साथ ही मुख्य अग्निशमन अधिकारी अजय शर्मा , जिला आपदा विशेषज्ञ गजेंद्र सिंह बघेल, डिप्टी सीएमओ डॉक्टर सुनील गुप्ता, चीफ वार्डन डॉ विपिन गुप्ता , थाना प्रभारी पिलखुवा श्याेपाल सिंह नवराज सिंह दीपक कुमार नीरज कुमार मोहित गोयल सतीश कुमार एवं अन्य द्वारा पूर्ण रूप से योगदान दिया गया।

मॉक ड्रिल के पश्चात आपदा प्रबंधन विशेषज्ञों एवं प्रशासनिक अधिकारियों द्वारा समीक्षा बैठक की गई, जिसमें व्यवस्थाओं की मजबूती, कमियों और सुधार के बिंदुओं पर चर्चा की गई। अधिकारियों ने स्टाफ को नियमित प्रशिक्षण, उपकरणों के रख-रखाव तथा समय-समय पर ऐसे अभ्यास दोहराने की आवश्यकता पर बल दिया।
कॉलेज प्रशासन ने कहा कि इस प्रकार की मॉकड्रिल से न केवल कर्मचारियों की सजगता बढ़ती है, बल्कि वास्तविक आपदा की स्थिति में घबराहट के बजाय अनुशासित और संगठित प्रतिक्रिया संभव हो पाती है, जिससे मरीजों और संस्थान की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके।

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