गोड्डा

देशव्यापी हड़ताल को लेकर 12 फरवरी को स्कूलों में बंद रहेगा मध्यान भोजन : मनोज कुमार 

 नेशनल प्रेस टाइम्स, ब्यूरो
गोड्डा। देशव्यापी हड़ताल को लेकर पूरे राज्य सहित गोड्डा जिले में ट्रेड यूनियन के लोगों द्वारा कमर कस लिया गया है। झारखंड राज्य विद्यालय रसोईया संघ के प्रदेश सचिव सह एक्टू के राष्ट्रीय कार्यकारिणी सदस्य मनोज कुमार कुशवाहा ने बताया कि देशव्यापी हड़ताल को लेकर सुबे सहित जिले के सभी स्कूलों में मध्यान भोजन बंद रहेगा। उन्होंने कहा कि केंद्रीय ट्रेड यूनियनों के आहृान पर 12 फरवरी 2026 को अखिल भारतीय आम हड़ताल सफल बनाएं। कहा कि मोदी सरकार ने 4 लेबर (श्रम) कोड लागू करने की पूरी तैयारी कर ली है. 21 नवंबर को अधिसूचित करने के बाद, इन्हें लागू करने के लिए केंद्रीय नियम बनाए जा रहे हैं. और फिर, 1 अप्रैल 2026 से 4 लेबर कोड लागू कर दिए जाएंगे. इन कोडों को मजदूरों का हितेषी साबित करने के लिए सरकार चौतरफा झूठा प्रचार चला रही है. अब तक मजदूरों को कानूनी सुरक्षा और कुछ अधिकार देने वाले सभी 29 श्रम कानूनों को खत्म कर बनाए गए 4 लेबर कोड मजदूरों को मालिकों के गुलाम बना देंगे. 100-150 साल पुरानी स्थिति में धकेल देंगे. ये कोड श्रमिकों के बड़े हिस्से को ‘श्रमिक’के दर्जे व दायरे से बाहर कर देंगे और उनका अस्तित्व ही खतरे में पड़ जाएगा. ये सभी श्रम कानून ब्रिटिश (औपनिवेशिक) शासन के खिलाफ भारतीय जनता के संघर्षों व कुर्बानियों से हासिल हुए थे. इसलिए, श्रम कानूनों को खत्म कर बनाए गए ये 4 कोड देश के संविधान पर एक बड़ा हमला हैं, और संविधान को खत्म करने की मोदी सरकार की साजिश का ही हिस्सा है. देश का मजदूर आंदोलन शुरू से ही इन कोडों का विरोध कर रहा है, और इन्हें रद्द करने की मांग कर रहा है. असल में, ये कोड मालिकों की मांग पर और आरएसएस-भाजपा से जुड़ी ट्रेड यूनियन, बीएमएस के समर्थन से लाए गए हैं. ये कोड सरकार के ‘‘इज ऑफ डूईंग बिजनेस’’ (धंधा करने में आसानी) को आगे बढ़ाने के लिए श्रमिकों का खून चूस कर कॉरपोरेटों/मालिकों के चरम मुनाफों को सुनिश्चित करने के लिए लाए गए हैं. साथ ही, सरकार ने श्रम शक्ति नीति 2025 (भारत की राष्ट्रीय श्रम और रोजगार नीति) पेश की है, जो श्रम को ‘‘धर्म’’ (पवित्र और नैतिक कर्तव्य) के रूप में परिभाषित करती है, न कि अधिकार के रूप में. कोड जारी करने से शुरू कर, मोदी सरकार ने एक महीने के भीतर हमलों की झड़ी लगा दी है. सबसे गरीब जनता के रोजगार से जुड़े महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) को खत्म कर ‘‘विकसित भारत-रोजगार और आजीविका गारंटी मिशन (ग्रामीण) कानून, 2025’’ (वीबी-ग्रामजी) बना दिया गया है; और महात्मा गांधी का नाम भी हटा दिया गया है. यह नया कानून, जब देश अत्यधिक बेरोज़गारी से जूझ रहा है, मांग एवं अधिकार-आधारित ग्रामीण रोजगार गारंटी को समाप्त कर केंद्र सरकार की मनमर्जी पर आधारित व्यवस्था लाता है और वित्तीय बोझ राज्यों पर डाल देता है. यह कटाई के मौसम में कानून के संचालन पर रोक लगाता है, जिससे जमींदारों को सस्ता श्रम सुनिश्चित होता है. इतना ही नहीं, इसका मुख्य उद्देश्य उद्योगों के लिए सस्ते श्रम की एक विशाल सेना तैयार करना है. ग्रामीण क्षेत्रों में काम न होने के कारण, वे रोजगार की तलाश में शहरों की ओर पलायन करने के लिए मजबूर होंगे और बदले में सस्ते श्रम की विशाल सेना का हिस्सा बन जाएंगे. जहां कोयला, रेल, डिफेंस, शिक्षा, स्वास्थ्य, आदि का जोरों से निजीकरण/निगमीकरण जारी है, बीमा क्षेत्र में 100 प्रतिशत प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की अनुमति का कानून बना दिया गया है, जिससे विदेशी कंपनियों को घरेलू बीमा व्यवस्था पर कब्ज़ा करने का अधिकार मिल जाएगा और यह सामाजिक सुरक्षा भी आम जनता की पहुंच से बाहर हो जाएगी. साथ ही, सरकार ने बिजली और खेती को अडानी, अंबानी सरीखे पूंजीपतियों के हवाले करने के लिए विद्युत (संशोधन) विधेयक, 2025 और बीज विधेयक जारी कर दिए हैं. यदि ये विधेयक पारित होते हैं, तो कृषि, घरेलू और एमएसएमई बिजली उपभोक्ताओं तथा देश के सार्वजनिक विद्युत क्षेत्र पर विनाशकारी प्रभाव पड़ेगा. यही नहीं, देश की परमाणु सुरक्षा और संप्रभुता को खतरे में डालते हुए एक बेहद संवेदनशील और खतरों से भरे परमाणु ऊर्जा उत्पादन क्षेत्र को निजी और विदेशी कंपनियों के हवाले कर दिया गया है. इसके लिए “सस्टेनेबल हार्नेसिंग एंड एडवांसमेंट ऑफ न्यूक्लियर एनर्जी फॉर ट्रांसफॉर्मिंग इंडिया (शांति) कानून”पास कर दिया गया है. देश के मजदूर और आम अवाम इन सभी अधिनियमों और विधेयकों को निरस्त करने की मांग करते हैं.
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