बेतुल
भाजपा की नई योजना ने मजदूरों को बना दिया असहाय: निलय डागा
39 आदिवासी मजदूर अपनी मजदूरी मांगने पहुंचे कलेक्ट्रेट

कांग्रेस जिला अध्यक्ष ने सरकार की योजना को बताया दुर्भाग्यपूर्ण
नेशनल प्रेस टाइम्स, ब्यूरो
बैतूल। प्रदेश में मनरेगा कानून में बदलाव के बाद हालात किस कदर बिगड़ चुके हैं, इसका जिंदा सबूत बैतूल जिले से सामने आया है, जहां 39 आदिवासी मजदूर अपनी मजदूरी का हक मांगने कलेक्टर कार्यालय की जनसुनवाई तक पहुंच गए। नागपुर से ओडिशा तक ठेकेदारी के नाम पर ले जाकर इन मजदूरों से बंधुआ मजदूरों की तरह काम कराया गया और अब 11 लाख रुपये की मजदूरी के लिए दर-दर भटकने की नौबत आ गई है।
इस पूरे मामले पर जिला कांग्रेस कमेटी अध्यक्ष निलय डागा ने तीखा बयान देते हुए कहा कि यह सब मनरेगा कानून में बदलाव का नतीजा है। उन्होंने कहा कि पहले सौ दिन का गारंटी वाला रोजगार था, मजदूर गांव में काम करता था, सम्मान से मजदूरी पाता था, लेकिन भाजपा सरकार ने मनरेगा कानून को कमजोर कर बीवीजी रामजी योजना लागू कर दी, जिससे मजदूरों का मजदूरी का अधिकार ही खत्म कर दिया गया।
– रोजगार नहीं तो ठगी तय
निलय डागा ने कहा कि रोजगार नहीं मिलने के कारण भोले-भाले आदिवासी मजदूर ठेकेदारों के झांसे में आ रहे हैं, ठगी और बंधुआ मजदूरी का शिकार हो रहे हैं। आज हालात यह हैं कि मजदूर अपने हक की मजदूरी मांगने कलेक्टर कार्यालय और जनसुनवाई तक पहुंचने को मजबूर हैं। यह सरकार की नाकामी और मजदूर विरोधी सोच का खुला प्रमाण है।
मजदूरों ने कलेक्टर से मांग की है कि उनकी करीब 11 लाख रुपये की मजदूरी दिलाई जाए और ठेकेदार विशाल सरकार तथा सूरज मालाकार के खिलाफ बंधुआ मजदूरी, बलात श्रम और जातिगत अपमान के अपराध में सख्त कानूनी कार्रवाई की जाए। कांग्रेस अध्यक्ष ने सवाल उठाया कि क्या मजदूर का अधिकार अब योजनाओं की भेंट चढ़ चुका है।
– ठेकेदारों के जाल में फंसे मजदूर
शिकायतकर्ताओं में गुलाबराव पिता भूरेसिंग कास्दे, मोकल कास्दे पिता जवाहरीलाल कास्दे, भोला काजले पिता सौतीलाल काजले, पतिराम बारस्कर पिता ओझा बारस्कर, सज्जन पिता शंभूलाल मवासे, कैलाश अखंडे पिता कमल अखंडे सहित कुल 39 मजदूर शामिल हैं, जिन्होंने बताया कि सितम्बर 2025 में सारनी मछलीकाटा निवासी ठेकेदार विशाल सरकार और सूरज मालाकार ने उन्हें प्रतिदिन 1000 रुपये मजदूरी, रहने और खाने की सुविधा का भरोसा देकर काम पर ले जाया। ट्रेन से नागपुर और फिर ओडिशा राज्य के अमोल नामक स्थान पर निर्माणाधीन पावर प्लांट में 17 से 18 दिन तक लगातार काम कराया गया, लेकिन लौटने के बाद मजदूरी देने से साफ इनकार कर दिया गया।



