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भारत ने कैसे हासिल की सड़क पर सैन्य विमान उतारने की खूबी?

पाकिस्तान-चीन के लिए सिरदर्द, जानें क्यों-कितने अहम

लखनऊ। भारत में हाईवे पर रनवे को बनाने की यह तकनीक क्या है और यह क्यों अहम है? भारत अब तक अपने कितने हाईवे को रनवे के तौर पर तैयार कर चुका है? देश के लिए इसका रणनीतिक महत्व क्या है? आइये जानते हैं…
असम के डिब्रूगढ़ में मोरान बायपास पर इमरजेंसी लैंडिंग फैसिलिटी (ईएलएफ) के सफल परीक्षण के साथ भारत ने अपने सीमाई इलाकों पर बड़ी रणनीतिक बढ़त हासिल कर ली है। दरअसल, इस हाईवे पर भारतीय वायुसेना का सी-130जे सुपर हरक्यूलीज एयरक्राफ्ट उतरा है, जो कि अपने वर्ग में सबसे बड़े सैन्य विमानों में से एक है। इसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी सवार थे। रक्षा विशेषज्ञों की मानें तो भारत की ओर से जिस तरह से अब पूर्वोत्तर में भी एक हाईवे को विमानों के रनवे के तौर पर इस्तेमाल किया है, यह चीन के लिए बड़ा सिरदर्द बन सकता है।
ऐसे में यह जानना अहम है कि आखिर भारत में हाईवे पर रनवे को बनाने की यह तकनीक क्या है और यह क्यों अहम है? भारत अब तक अपने कितने हाईवे को रनवे के तौर पर तैयार कर चुका है? देश के लिए इसका रणनीतिक महत्व क्या है? आइये जानते हैं…
क्या है भारत की हाईवे को रनवे के तौर पर इस्तेमाल करने की तकनीक?
भारत में हाईवे को रनवे के तौर पर इस्तेमाल करने की तकनीक को इमरजेंसी लैंडिंग फैसिलिटी (ईएलएफ) कहा जाता है। यह राष्ट्रीय राजमार्ग प्रणाली के भीतर ही निर्मित एक वैकल्पिक रनवे होता है, जिसे विशेष रूप से सैन्य और आपातकालीन जरूरतों के लिए डिजाइन किया जाता है।
इन हाईवे स्ट्रिप्स को भारतीय वायुसेना (आईएएफ) के समन्वय से बनाया जाता है। इन्हें विशेष पेवमेंट क्वालिटी कंक्रीट (पीक्यूसी) से तैयार किया जाता है, ताकि ये आधुनिक विमानों के उतरते समय पैदा होने वाली अत्यधिक गर्मी और उनके भारी वजन को सहने लायक क्षमता के बन सकें। सामान्य सड़कों की तुलना में इनकी सतह अधिक मोटी होती है और इनका आधार ठोस कंक्रीट का होता है।
तकनीकी क्षमता: ये रनवे 40 टन तक के लड़ाकू विमानों- जैसे राफेल, सुखोई, तेजस, मिराज और 74 टन तक के भारी रणनीतिक परिवहन विमानों- जैसे सी-17 ग्लोबमास्टर और सी-130जे सुपर हरक्यूलिस की लैंडिंग और टेक-आॅफ को संभालने में सक्षम हैं।
डिजाइन और संरचना: ये आमतौर पर 2 से 4.5 किलोमीटर लंबे सीधे हाईवे स्ट्रेच होते हैं। इनके बीच के डिवाइडर (सेंट्रल रिजर्वेशन) हटाए जाने के लायक क्रैश बैरियर से बने होते हैं, जिन्हें विमान संचालन के समय जल्दी से हटाया जा सकता है ताकि विमान सड़क की पूरी चौड़ाई का इस्तेमाल कर सके। इसके अलावा पास में ही विमानों की पार्किंग के लिए ऐप्रन और टैक्सीवे जैसी सुविधाएं भी विकसित की जा सकती हैं।
यह तकनीक एक नागरिक मार्ग को कुछ ही मिनटों में सैन्य रनवे में बदलने की अनुमति देती है। हालांकि, पूर्ण संचालन शुरू करने से पहले मलबे को साफ करना और हवाई क्षेत्र के लिए जरूरी उपकरण वहां तैनात करना जरूरी होता है।
भारत अब तक अपने कितने हाईवे को लड़ाकू विमानों के लायक तैयार कर चुका?
केंद्र सरकार और वायुसेना ने देश में कुल 28 ईएलएफ साइट्स की पहचान की, जो आपात स्थितियो में लड़ाकू विमानों के लिए अहम साबित हो सकती हैं। भारत में मौजूदा समय में लगभग 15 ऐसे ईएलएफ चालू हो चुके हैं, जो राजस्थान के रेगिस्तान से लेकर उत्तर प्रदेश के एक्सप्रेस-वे और पूर्वोत्तर के रणनीतिक क्षेत्रों तक फैले हुए हैं। इनमें यमुना एक्सप्रेस-वे, आगरा-लखनऊ एक्सप्रेसवे, और राजस्थान में एनएच-925ए जैसे महत्वपूर्ण स्थल शामिल हैं।
कहां-कहां स्थित हैं भारत के प्रमुख ईएलएफ?
1. असम (पूर्वोत्तर) मोरन बाईपास (एनएच-127/एनएच-37): यह पूर्वोत्तर भारत का पहला ईएलएफ है, जो डिब्रूगढ़ जिले में स्थित है। यह 4.2 किलोमीटर लंबी पट्टी रणनीतिक रूप से चीन सीमा (एलएसी) के करीब है।
2. उत्तर प्रदेश -यहां देश के प्रमुख एक्सप्रेसवे पर कई ईएलएफ स्थित हैं
यमुना एक्सप्रेस-वे: यहां 2015 में पहली बार लड़ाकू विमान उतारने का सफल परीक्षण किया गया था।
आगरा-लखनऊ एक्सप्रेस-वे: उन्नाव के पास बांगरमऊ में हवाई पट्टी बनाई गई है।
पूर्वांचल एक्सप्रेसवे: यहां भी लड़ाकू विमानों के लिए लैंडिंग की सुविधा उपलब्ध है।
गंगा एक्सप्रेसवे: शाहजहांपुर के पास स्थित यह ईएलएफ भारत की पहली ऐसी पट्टी है जिसमें रात में लैंडिंग करने की क्षमता है।
3. राजस्थान-एनएच-925ए (बाड़मेर): यह किसी राष्ट्रीय राजमार्ग पर विकसित की गई भारत की पहली ईएलएफ है, जिसका उद्घाटन सितंबर 2021 में किया गया था।
4. आंध्र प्रदेश-एनएच-16 (बापटला): यहां मार्च 2024 में सुखोई और अन्य विमानों के साथ लैंडिंग ट्रायल किया गया था।
5. जम्मू और कश्मीर-एनएच-44 (अनंतनाग): इस रणनीतिक क्षेत्र में भी ईएलएफ का सफल परीक्षण किया जा चुका है, जिसमें चिनूक जैसे भारी हेलीकॉप्टरों ने हिस्सा लिया था। इस क्षेत्र में भारत के ईएलएफ की मौजूदगी पाकिस्तान के लिए बड़ी परेशानी पैदा कर सकती है।
रणनीतिक रूप से कितने अहम होते हैं ये इमरजेंसी लैंडिंग फैसिलिटी?
युद्ध की स्थिति में अगर मुख्य हवाई पट्टियां ध्वस्त या क्षतिग्रस्त हो जाती हैं, तो ये ईएलएफ वायुसेना को एक सुरक्षित बैकअप के तौर पर विकल्प प्रदान करते हैं। यानी भारत के हाईवे ही वायुसेना के लिए वैकल्पिक रनवे बन सकते हैं।
चीन सीमा (एलएसी) के करीब मोरान (असम) जैसे क्षेत्रों में इनकी मौजूदगी सैनिकों की तुरंत तैनाती और रसद प्रबंधन को मजबूत करती है। मोरान ईएलएफ चीन सीमा से लगभग 300 किमी दूर है, जो पास के चाबुआ-तेजपुर जैसे प्रमुख हवाई ठिकानों के लिए एक अहम बैकअप बन सकती है। यह उन कमजोरियों को दूर कर सकता है जो 1962 के युद्ध के दौरान देखी गई थीं।
लैंडिंग विकल्पों को पूरे राष्ट्रीय राजमार्ग नेटवर्क पर फैलाकर, भारत प्रभावी रूप से एक ऐसा हवाई रक्षा ग्रिड तैयार कर रहा है, जिसे किसी भी दुश्मन के लिए स्थिर एयरबेस की तुलना में निशाना बनाना या निष्क्रिय करना बहुत कठिन होता है। यह संकट के समय वायु शक्ति को बिखेरने और सुरक्षित रखने की क्षमता को भी बढ़ाता है।
इन स्ट्रिप्स पर विमानों में जल्दी से रिफ्यूलिंग (ईंधन आपूर्ति) और रिआर्म (हथियारों को लोड) किया जा सकता है, जो युद्ध क्षेत्र में तत्काल प्रतिक्रिया के लिए अहम है। पाकिस्तान से संघर्ष की स्थिति में भारत के उत्तर-पश्चिम में मौजूद इमरजेंसी लैंडिंग स्ट्रिप काफी कारगर साबित हो सकती हैं।
ईएलएफ का एक इस्तेमाल मानवीय सहायता और आपदा राहत के लिए किया जा सकता है, जिससे दूर-दराज के क्षेत्रों में भारी विमानों के माध्यम से राहत सामग्री और चिकित्सा सहायता सीधे पहुंचाई जा सके। खासकर पूर्वोत्तर के जंगल वाले क्षेत्रों और भारत के उत्तर में पहाड़ी इलाकों में।

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