बागपत
होली रंगों का त्यौहार है, लेकिन जच्चा और बच्चा का बचाव सबसे जरूरी

डॉ. सुमेधा आर्य
उत्तम हॉस्पिटल – दिल्ली-सहारनपुर रोड, बड़ौत
नेशनल प्रेस टाइम्स, ब्यूरो।
बड़ौत/बागपत : होली… यानी रंग, उमंग, हंसी और रिश्तों की मिठास।
हर गली में उड़ता गुलाल, ढोल की थाप और “बुरा न मानो होली है” की गूंज।
लेकिन जब घर में नई किलकारी गूंजी हो… जब एक मां ने अभी-अभी जीवन को जन्म दिया हो… तब यह त्योहार केवल रंगों का नहीं, बल्कि जिम्मेदारी और संवेदनशीलता का भी बन जाता है।
प्रसिद्ध स्त्री एवं प्रसूति रोग विशेषज्ञ डॉ. सुमेधा आर्य का कहना है कि होली की खुशी जरूर मनाएं, लेकिन जच्चा (नई मां) और नवजात शिशु की सुरक्षा सर्वोपरि होनी चाहिए।
नवजात शिशु: फूल से भी ज्यादा नाजुक
नवजात शिशु की त्वचा अत्यंत पतली और संवेदनशील होती है।
बाज़ार में मिलने वाले अधिकांश रंगों में—
लेड (सीसा)
क्रोमियम
माइका पाउडर
कृत्रिम डाई और केमिकल
जैसे तत्व मिलाए जाते हैं, जो बच्चे की त्वचा पर गंभीर एलर्जी, रैशेज़, आंखों में जलन या संक्रमण पैदा कर सकते हैं।
डॉ. आर्य बताती हैं—
“जीवन के पहले 28 दिन नवजात के लिए ‘नियोनेटल पीरियड’ कहलाते हैं। इस समय बच्चे की प्रतिरोधक क्षमता पूर्ण विकसित नहीं होती। जरा सी लापरवाही भी संक्रमण का कारण बन सकती है।”
भीड़भाड़, रंगों की उड़ती धूल और अनगिनत लोगों का संपर्क— ये सभी नवजात के लिए जोखिम बढ़ाते हैं।
जच्चा की स्थिति: बाहर से मुस्कान, अंदर से कमजोरी
अक्सर समाज केवल बच्चे पर ध्यान देता है, लेकिन मां की स्थिति भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।
प्रसव के बाद:
शरीर में रक्त की कमी हो सकती है
हार्मोनल बदलाव जारी रहते हैं
टांकों या ऑपरेशन (सी-सेक्शन) की रिकवरी चल रही होती है
संक्रमण का खतरा अधिक रहता है
ऐसे समय में ठंडे पानी से नहाना, घंटों धूप में रहना या केमिकल रंगों के संपर्क में आना स्वास्थ्य के लिए खतरनाक हो सकता है।
डॉ. सुमेधा आर्य स्पष्ट कहती हैं—
“प्रसव के बाद कम से कम 40 दिन तक मां को विशेष सावधानी बरतनी चाहिए। यह समय शरीर के पुनर्निर्माण का होता है।”
संक्रमण का अदृश्य खतरा
होली में लोग गले मिलते हैं, चेहरे पर रंग लगाते हैं, एक-दूसरे के घर जाते हैं।
लेकिन नवजात और जच्चा के लिए यह संपर्क जोखिम भरा हो सकता है।
वायरल संक्रमण
सर्दी-जुकाम
त्वचा संक्रमण
आंखों में इंफेक्शन
त्योहार की मस्ती में छोटी सी बीमारी भी गंभीर रूप ले सकती है।
कैसे मनाएं सुरक्षित होली?
क्या करें:
यदि खेलना ही हो तो केवल घर के अंदर, सूखे और प्राकृतिक (हर्बल) गुलाल का हल्का प्रयोग करें।
नवजात को पूरी तरह ढककर रखें।
बाहर से आने वालों को पहले हाथ धोने और सैनिटाइज़ करने को कहें।
मां को पर्याप्त आराम और पौष्टिक आहार दें।
भीड़ और तेज ध्वनि (डीजे) से दूरी बनाए रखें।
क्या न करें:
नवजात के चेहरे या शरीर पर रंग न लगाएं।
केमिकल युक्त या गीले रंगों का उपयोग न करें।
जच्चा को जबरन त्योहार में शामिल न करें।
ठंडे पानी या तेज धूप से बचें।
भावनात्मक पहलू: असली रंग कौन सा?
होली के रंग एक दिन में उतर जाते हैं…
लेकिन मां और बच्चे की सेहत जीवन भर का आधार होती है।
घर में जब एक मां रात-रात भर जागकर अपने बच्चे को सीने से लगाती है…
जब एक नन्हीं सांस पूरे परिवार की दुनिया बदल देती है…
तो उस घर की सबसे बड़ी होली वही होती है।
डॉ. सुमेधा आर्य का संदेश बेहद भावुक और सार्थक है—
“त्योहार हर साल आते हैं, लेकिन नवजात का पहला वर्ष जीवन में एक बार ही आता है। इस अमूल्य समय को सुरक्षित रखना ही सच्ची खुशी है।”
इस होली, जिम्मेदारी का रंग लगाइए
रंगों से ज्यादा जरूरी है—
मां की मुस्कान
बच्चे की कोमल त्वचा
परिवार की सजगता
इस बार यदि आपके घर में नई जिंदगी आई है, तो होली थोड़ी सादगी से मनाइए।
रंगों से नहीं… सावधानी, ममता और प्रेम से घर को रंगिए।
क्योंकि सच्ची होली वही है—
जहां खुशियां सुरक्षित हों, और मां-बच्चा स्वस्थ।



