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सुप्रीम कोर्ट ने एनसीईआरटी के किस पाठ पर जताई नाराजगी

जानें किताब में ऐसा क्या, पहले कब हुए पाठ्यक्रम पर विवाद

नई दिल्ली। एनसीईआरटी की सामाजिक विज्ञान की 8वीं की किताब में ऐसा क्या कहा गया है? इसे लेकर सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा? एनसीईआरटी की किताब में दिए गए पाठ को लेकर प्रमुख न्यायविदों का क्या कहना है? इसके अलावा एनसीईआरटी से जुड़े हालिया विवाद क्या रहे हैं?
राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी) की सामाजिक विज्ञान की किताब के एक अध्याय पर बवाल हो गया। न्यायपालिका ने इसे लेकर नाराजगी जताई। दरअसल, कक्षा आठ की किताब न्यायपालिका में भ्रष्टाचार और लंबित केसों की जानकारी दी गई है। इसे लेकर गुरुवार को देश की सर्वोच्च अदालत ने स्वत: संज्ञान लिया और मामले पर टिप्पणी की। सीजेआई सूर्यकांत के नेतृत्व वाली तीन जजों की पीठ ने इस मामले में एनसीईआरटी के निदेशक को नोटिस जारी कर जवाब मांगा और आदेश दिया कि छपी हुई किताबों को तत्काल प्रभाव से वापस लिया जाए और इसका सकुर्लेशन रोका जाए।
ऐसे में यह जानना अहम है कि आखिर एनसीईआरटी की सामाजिक विज्ञान की 8वीं की किताब में ऐसा क्या कहा गया है, जिस पर विवाद की स्थिति पैदा हो गई? इसे लेकर सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा? एनसीईआरटी की किताब में दिए गए पाठ को लेकर प्रमुख न्यायविदों का क्या कहना है? इसके अलावा एनसीईआरटी से जुड़े हालिया विवाद क्या रहे हैं? आइये जानते हैं…
पहले जानें- एनसीईआरटी की किताब में किस बात पर चर्चा?
एनसीईआरटी की कक्षा आठ की नई सामाजिक विज्ञान की पाठ्यपुस्तक में ‘हमारे समाज में न्यायपालिका की भूमिका’ नाम से एक अध्याय जोड़ा गया है, जिसमें न्यायपालिका के सामने आने वाली चुनौतियों का जिक्र किया गया। इस अध्याय में लिखी गई कुछ बातें मौजूदा समय में विवादों के केंद्र में हैं।
1. न्यायपालिका में भ्रष्टाचार पर
किताब में स्पष्ट रूप से लिखा गया था कि लोग न्यायपालिका के विभिन्न स्तरों पर भ्रष्टाचार का सामना करते हैं। इसमें कहा गया है कि भ्रष्टाचार के कारण गरीब और वंचित वर्ग के लोगों के लिए न्याय तक पहुंच का मुद्दा और भी बदतर या मुश्किल हो जाता है।
इसमें कहा गया है कि न्यायाधीश एक आचार संहिता से बंधे होते हैं, जो न केवल अदालत के अंदर, बल्कि अदालत के बाहर भी उनके व्यवहार को नियंत्रित करती है।
न्यायपालिका में जवाबदेही बनाए रखने के लिए आंतरिक तंत्र और ‘केंद्रीकृत लोक शिकायत निवारण और निगरानी प्रणाली’ (उढॠफअटर) का जिक्र किया गया है। किताब में बताया गया है कि इसके जरिए 2017 से 2021 के बीच 1600 से ज्यादा शिकायतें दर्ज हुई थीं।
इसमें यह भी जोड़ा गया है कि राज्य और केंद्र के स्तर पर लोगों में विश्वास जगाने, न्याय प्रणाली में तकनीक के इस्तेमाल से पारदर्शिता बढ़ाने और भ्रष्टाचार के मामलों में तत्काल और निर्णायक कार्रवाई करने के लिए लगातार कदम उठाए जा रहे हैं।
किताब में सुप्रीम कोर्ट के पूर्व चीफ जस्टिस बीआर. गवई के जुलाई 2025 के एक बयान को शामिल किया गया है। इसमें उन्होंने कहा था कि न्यायपालिका के अंदर भ्रष्टाचार और दुराचार की घटनाओं के सामने आने से जनता के विश्वास पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है, लेकिन इन मुद्दों के समाधान के लिए तत्काल, निर्णायक और पारदर्शी कार्रवाई से इस भरोसे को फिर से कायम किया जा सकता है।
2. अदालतों में लंबित याचिकाओं पर
किताब में न्यायपालिका के सामने आने वाली प्रमुख चुनौतियों में भ्रष्टाचार के साथ-साथ लंबित मामलों के भारी बोझ का भी जिक्र किया गया है।
इस भारी बैकलॉग के लिए न्यायाधीशों की कमी, जटिल कानूनी प्रक्रियाएं और खराब बुनियादी ढांचे जैसी बातों को वजह बताया गया है।
पाठ्यपुस्तक में लंबित मामलों की गंभीरता को समझाने के लिए भारत की विभिन्न अदालतों के अनुमानित आंकड़े भी दिए गए हैं।
अब जानें- इस किताब को लेकर क्या आईं प्रतिक्रियाएं?
एनसीईआरटी की नई किताब में न्यायपालिका में भ्रष्टाचार से जुड़े पाठ को लेकर कई तीखी प्रतिक्रियाएं सामने आईं। इस मुद्दे का जिक्र सबसे पहले सुप्रीम कोर्ट में वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल और अभिषेक मनु सिंघवी ने किया। इसके बाद भारत के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत ने पाठ पर आपत्ति जताई।
सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस ने क्या कहा?
बुधवार (25 फरवरी) को वरिष्ठ वकील सिब्बल और सिंघवी की तरफ से इस मुद्दे को उठाए जाने के बाद सुप्रीम कोर्ट में चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने मामले पर अपना रुख जाहिर किया और इस पाठ पर सख्त नाराजगी जाहिर की। उन्होंने कहा कि उन्हें इस संबंध में कई फोन और संदेश मिले हैं और हाईकोर्ट के कई न्यायाधीश भी किताब की सामग्री से बहुत परेशान हैं। उन्होंने इसे न्यायपालिका को बदनाम करने का एक बहुत गहरा और सोचा-समझा कदम भी बताया।
गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट की ओर से मामले का स्वत: संज्ञान लेने के बाद एनसीईआरटी ने कहा कि वे बिना शर्त माफी मांगने को तैयार है। किताब से विवादित अंश को भी हटा दिया जाएगा। इस पर चीफ जस्टिस ने कहा कि केवल माफी मांगना और किताब से आपत्तिजनक अंशों को हटाना पर्याप्त नहीं है। एनसीईआरटी के निदेशक को कारण बताना होगा। ये सोच-समझकर उठाया गया कदम है। अदालत ने सवाल किया कि इस मामले को अवमानना क्यों न माना जाए? चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने आॅनलाइन प्रतियों को भी तत्काल हटाने के निर्देश दिए।
एनसीईआरटी की पुरानी किताब में क्या था?
पहले एनसीईआरटी की कक्षा आठ की सामाजिक विज्ञान की किताब में न्यायपालिका का जिक्र तो था, लेकिन इसमें न्यायपालिका की भूमिका, इसकी स्वतंत्रता, अदालतों का ढांचा और उन तक पहुंच की जानकारी दी गई थी। इसके अलावा किताब में जजों की नियुक्ति और उन्हें हटाने के साथ-साथ महाभियोग चलाने की प्रक्रिया का भी जिक्र किया गया था। हालांकि, पुरानी किताब में भ्रष्टाचार से जुड़ी बातों का जिक्र नहीं था।
इससे पहले कब हुआ है एनसीईआरटी के पाठ्यक्रम पर विवाद?
एनसीईआरटी की तरफ से पाठ्यक्रम में बदलाव को लेकर विवाद पहली बार नहीं हुआ है। बीते साल भी किताबों में कुछ नई चीजों को जोड़ने और पुरानी चीजों को हटाने का मुद्दा उठा था।
1. एनसीईआरटी के नए मॉड्यूल पर विवाद
एनसीईआरटी ने कक्षा 6 से 12 तक के छात्रों के लिए भारत विभाजन पर दो विशेष मॉड्यूल जारी किए थे। इन मॉड्यूल्स में भारत के विभाजन के लिए मुख्य रूप से तीन पक्षों- जिन्ना, जिन्होंने अलग देश की मांग की); कांग्रेस, जिसने हिंसा के डर से इस मांग को मान लिया और लॉर्ड माउंटबेटन, जिन्होंने जल्दबाजी में इसे लागू किया को जिम्मेदार ठहराया गया था।
इसमें यह भी कहा गया था कि नेहरू और पटेल ने मजबूर होकर विभाजन पर सहमति दी थी। इन मॉड्यूल्स को लेकर कांग्रेस, एआईएमआईएम और अन्य विपक्षी दलों ने एनसीईआरटी पर इतिहास को तोड़-मरोड़कर पेश करने का आरोप लगाया था।
2. संवेदनशील विषयों को पाठ्यक्रम से हटाया गया
2024 में एनसीईआरटी ने राजनीति विज्ञान की पाठ्यपुस्तक से बाबरी मस्जिद, गुजरात दंगे और अल्पसंख्यकों जैसे संवेदनशील विषयों को हटा दिया। पाठ्यपुस्तक से बाबरी मस्जिद, गुजरात दंगे और अल्पसंख्यकों जैसे संवेदनशील विषयों को हटाना शामिल रहा। एनसीईआरटी की पाठ्यक्रम मसौदा समिति द्वारा तैयार किए गए परिवर्तनों का विवरण देने वाले एक दस्तावेज के अनुसार, राम जन्मभूमि आंदोलन के संदर्भों को “राजनीति में नवीनतम बदलावों के अनुसार बदला गया है। इसके अलावा 2002 के गोधरा दंगों से जुड़े विषय में भी बदलाव किया गया है।
3. मुगलकाल से जुड़े इतिहास के अध्याय में किए बदलाव
जुलाई 2025 में भी मुगलकाल से लेकर शिवाजी तक को लेकर इतिहास की किताबों में कुछ बदलाव किए गए। इसके अलावा दिल्ली सल्तनत से जुड़े इतिहास को बर्बर करार देने के साथ मुगल काल में बाबर, अकबर और औरंगजेब के शासनकाल को खास तौर पर असहिष्णु करार देते हुए इन्हें क्रूरता से जोड़ा गया था। हालांकि, किताब में एक दिशा-निर्देश भी जोड़ा गया था, जिसमें कहा गया है कि इतिहास के काले अध्याय को बिना किसी दुराग्रह के पढ़ा जाना जरूरी है, वह भी आज के समय में किसी को दोष दिए बिना, ताकि इतिहास की गलतियों को सुधारा जा सके और एक ऐसे भविष्ट की परिकल्पना की जा सके, जिसमें ऐसी घटनाएं नहीं होंगी।

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