उत्तरकाशी

गंगोत्री और यमुनोत्री क्लस्टर

उत्तरकाशी में शहरी नदी प्रबंधन योजनाओं हेतु पाँच दिवसीय क्षेत्रीय भ्रमण एवं बहु-हितधारक बैठक

नेशनल प्रेस टाइम्स, ब्यूरो

उत्तरकाशी : नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ अर्बन अफेयर्स (NIUA) एवं राज्य स्वच्छ गंगा मिशन, उत्तराखण्ड की टीम ने गंगा नदी बेसिन के शहरों के लिए विकसित किये जाने वाली शहरी नदी प्रबंधन योजना के निर्माण के उत्तरकाशी जिले के गंगोत्री और यमुनोत्री क्षेत्रों का पाँच दिवसीय क्षेत्रीय दौरा किया। इस पहल का उद्देश्य नदी संरक्षण को शहरी नियोजन के साथ समन्वित करते हुए पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्रों में नदी तंत्र की सुरक्षा सुनिश्चित करना है।
शहरी नदी प्रबंधन योजना का ढाँचा नदी पारिस्थितिकी तंत्र की सुरक्षा, जल गुणवत्ता में सुधार, बाढ़ नियंत्रण, नदी-संवेदी शहरी नियोजन को बढ़ावा देने तथा नदी पर निर्भर समुदायों के लिए सतत आजीविका सुनिश्चित करने पर केंद्रित है। वर्तमान में गंगा बेसिन के 27 शहरों के लिए ये योजनाएँ तैयार की जा रही हैं, जिनमें उत्तराखंड के छह शहर—यमुनोत्री, गंगोत्री, ऋषिकेश, हरिद्वार, हल्द्वानी-काठगोदाम और रामनगर शामिल हैं।
इस दौरान नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ अर्बन अफेयर्स की टीम, जिसमें श्री राहुल सचदेवा, सीनियर प्रोग्राम स्पेशलिस्ट; श्री राजेश पई, वॉश इंस्टीट्यूट में सीनियर टेक्निकल एडवाइजर; इश्लीन कौर, सीनियर एनवायरनमेंटल स्पेशलिस्ट, अर्श, प्रोजेक्ट मैनेजर (NIUA) एवं राज्य स्वच्छ गंगा मिशन , उत्तराखंड से रोहित जयाड़ा, मॉनिटरिंग विशेषज्ञ शामिल रहे I इसके अतिरिक्त ली एसोसिएट्स के साथ मिलकर विस्तृत क्षेत्रीय आकलन किया। ली एसोसिएट्स उत्तराखंड राज्य में URMP तैयार करने के लिए परामर्शदाता के रूप में कार्य कर रही संस्था है। टीम ने गंगोत्री क्लस्टर के अंतर्गत आने वाले धराली, मुखबा, बगोरी, हर्षिल और गंगोत्री धाम का दौरा किया।
टीम ने नदी तथा उससे जुड़े बसावट क्षेत्रों पर पड़ने वाले पारिस्थितिक और पर्यावरणीय प्रभावों का अध्ययन किया। इस दौरान नदी तट की स्थिरता, तीर्थयात्रा और पर्यटन से बढ़ते दबाव, जलवायु संबंधी जोखिमों तथा नाजुक हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र पर पड़ रहे प्रभावों पर विशेष ध्यान दिया गया।
धराली, जहाँ वर्ष 2025 में एक बड़ी आपदा हुई थी, नदी तट के निकट स्थित बस्तियों की संवेदनशीलता और जोखिम को उजागर करता है। यह क्षेत्र नदी तटीय क्षेत्रों में लचीले और सुरक्षित नियोजन उपायों की आवश्यकता को रेखांकित करता है। इस दौरान टीम ने स्थानीय निवासियों, समुदाय प्रतिनिधियों और अन्य हितधारकों से संवाद कर क्षेत्र में मौजूद पर्यावरणीय चुनौतियों और विकास संबंधी दबावों को समझा।
यमुनोत्री क्लस्टर, जिसमें खरसाली, जानकी चट्टी और यमुनोत्री शामिल हैं, का भी आकलन किया गया। स्थल निरीक्षण के दौरान नदी किनारों पर अनियंत्रित निर्माण, नाजुक पर्वतीय भू-परिदृश्य पर बढ़ते दबाव तथा नदी पारिस्थितिकी तंत्र की सुरक्षा हेतु योजनाबद्ध अवसंरचना की आवश्यकता जैसे मुद्दे सामने आए।
पारिस्थितिक आकलन के पश्चात टीम ने नदी स्वास्थ्य को प्रभावित करने वाले स्वच्छता और अपशिष्ट प्रबंधन से जुड़े मुद्दों का भी अध्ययन किया। इनमें सीवेज शोधन की अपर्याप्त व्यवस्था, बस्तियों में ठोस अपशिष्ट का संचय तथा चार धाम यात्रा के दौरान उत्पन्न होने वाला कचरा प्रमुख रूप से शामिल हैं। टीम ने सीवेज उपचार संयंत्रों तथा बेहतर अपशिष्ट प्रबंधन प्रणालियों की आवश्यकता पर बल दिया, ताकि नदियों के प्रदूषण को रोका जा सके और जल गुणवत्ता को बनाए रखा जा सके।
टीम ने तीर्थयात्रा के दौरान उपयोग में आने वाले खच्चरों और अन्य भारवाहक पशुओं से उत्पन्न अपशिष्ट का भी अवलोकन किया, जो स्थानीय निवासियों और तीर्थयात्रियों दोनों के लिए स्वच्छता संबंधी समस्याएँ उत्पन्न करता है। इन समस्याओं का समाधान नदी पर्यावरण की सुरक्षा और सुरक्षित तथा स्वच्छ तीर्थ मार्ग सुनिश्चित करने के लिए अत्यंत आवश्यक माना गया।
मैदानी भ्रमण के निष्कर्षों को प्रस्तुत करने और संभावित हस्तक्षेपों पर चर्चा के लिए 13 मार्च 2026 को उत्तरकाशी के जिला मजिस्ट्रेट कार्यालय में बहु-हितधारक कार्यसमिति की बैठक जिला अधिकारी प्रशांत आर्य की अध्यक्षता में आयोजित की गई।
बैठक में सिंचाई विभाग, जल संस्थान, जिला प्रशासन, पंचायती राज संस्थाएँ, धार्मिक संगठनों तथा अन्य संबंधित विभागों के प्रतिनिधियों ने भाग लिया।
इसके अतिरिक्त राज्य स्वच्छ गंगा मिशन , उत्तराखंड से बैठक में मौजूद रोहित जयाड़ा, मॉनिटरिंग विशेषज्ञ एवं सिद्धार्थ ने राज्य में चल रहे नदी संरक्षण प्रयासों से संबंधित महत्वपूर्ण सुझाव दिए।
बैठक के दौरान NIUA की टीम ने क्षेत्रीय भ्रमण के दौरान पहचानी गई प्रमुख पर्यावरणीय चिंताओं, नदी से जुड़े मुद्दों तथा प्रस्तावित हस्तक्षेपों को प्रस्तुत किया। चर्चा का मुख्य केंद्र नदियों की पारिस्थितिक अखंडता की रक्षा, स्वच्छता अवसंरचना को सुदृढ़ करना, अपशिष्ट प्रबंधन प्रणालियों में सुधार तथा पर्यटन और तीर्थयात्रा गतिविधियों के सतत प्रबंधन पर रहा।
टीम ने यह भी स्वीकार किया कि वार्षिक चार धाम यात्रा के दौरान बड़ी संख्या में आने वाले पर्यटकों और तीर्थयात्रियों के कारण स्थानीय अवसंरचना और पर्यावरण पर काफी दबाव पड़ता है। इस संदर्भ में नदी-संवेदी नियोजन दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता पर बल दिया गया, जिससे तीर्थ पर्यटन और पारिस्थितिक संरक्षण के बीच संतुलन स्थापित किया जा सके।
शहरी नदी प्रबंधन योजनाओं के अंतर्गत नदी से जुड़े स्थानीय आर्थिक गतिविधियों को सुदृढ़ करने तथा स्थानीय समुदायों के लिए सतत आजीविका के अवसर विकसित करने की संभावनाओं पर भी विचार किया जाएगा। साथ ही पर्यावरणीय सुरक्षा उपायों को सुनिश्चित करते हुए जल गुणवत्ता में सुधार और हिमालयी नदी पारिस्थितिकी तंत्र की प्राकृतिक और पवित्र स्थिति को संरक्षित करने पर विशेष ध्यान दिया जाएगा।
यह परामर्श प्रक्रिया उत्तराखंड के उच्च हिमालयी क्षेत्रों में नदी प्रबंधन के लिए स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप रणनीतियाँ विकसित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है, जिससे विकास संबंधी हस्तक्षेप पारिस्थितिक संरक्षण और क्षेत्र की पवित्र नदी प्रणालियों की दीर्घकालिक सुरक्षा के अनुरूप सुनिश्चित किए जा सकें।

Show More

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button