जामताड़ा की टूटी पुलिया, मौत से खेल रहे लोग, प्रशासन और ग्रामीण दोनों की चुप्पी
Jamtara's culvert is broken, people are playing with death, both administration and villagers are silent

नेशनल प्रेस टाइम्स ब्यूरो।
जामताड़ा। जिला मुख्यालय से मात्र एक किलोमीटर दूर, दक्षिणबहाल पुलिस लाइन के समीप स्थित पुलिया पिछले दिनों मूसलाधार बारिश में बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गई। यह पुलिया चार मज़बूत पिलरों पर टिकी हुई थी, लेकिन पानी के तेज़ बहाव में पिलर धराशायी हो गए और बीच का हिस्सा टूट गया। आज स्थिति यह है कि यह पुलिया मौत के कुएँ की तरह दिखाई देती है। देखने वाला कोई भी सहम जाए, लेकिन मजबूरी में लोग इसे पार कर रहे हैं। पुलिया की हालत इतनी जर्जर हो चुकी है कि अब इससे केवल मोटरसाइकिल जैसे हल्के वाहन ही गुजर पा रहे हैं। कोई पैदल या साइकिल से निकलता है तो दिल दहल जाता है। ऑटो, चारपहिया या भारी वाहन बिल्कुल भी नहीं जा सकते। नीचे से मिट्टी बह चुकी है और गड्ढों ने पुलिया की बुनियाद को खोखला कर दिया है। जब पुलिया पूरी तरह क्षतिग्रस्त हो गई, तब प्रशासन ने दोनों ओर सीमेंट और ईंट से दीवार बनाकर रास्ता रोक दिया। साथ ही चेतावनी बोर्ड भी लगाया गया कि “इस पुलिया से जो पार होगा, वह स्वयं जिम्मेदार होगा।” लेकिन चूँकि यह रास्ता आसपास के कई गाँवों के लिए मुख्य मार्ग है, इसलिए ग्रामीणों ने चेतावनी की परवाह नहीं की। कुछ ही दिनों में अस्थायी दीवारें तोड़ दी गईं और अब लोग फिर से मोटरसाइकिल से गुजरने लगे। पुलिया की स्थिति देखकर किसी भी पल बड़ा हादसा हो सकता है। नीचे से मिट्टी खिसक चुकी है, पिलर टूट चुके हैं, और बीच का हिस्सा पूरी तरह डगमगा चुका है। इस हालत में भी लोग रोज़ इस पर से गुजरते हैं। देखने वालों की साँसें अटक जाती हैं, लेकिन पुल पार करने वालों की मजबूरी उनकी जान से बड़ी साबित हो रही है। हैरानी की बात यह है कि अब तक इस मुद्दे पर किसी ग्रामीण ने सार्वजनिक बयान नहीं दिया है। न ही प्रशासनिक स्तर पर कोई ठोस प्रतिक्रिया सामने आई है। आमतौर पर ऐसी घटनाओं पर लोगों का आक्रोश देखने को मिलता है, लेकिन यहाँ न तो ग्रामीण खुलकर कुछ कह रहे हैं और न ही अधिकारी। दोनों ओर चुप्पी ने इस मामले को और गंभीर बना दिया है। फिलहाल स्थिति यह है कि केवल मोटरसाइकिल से ही लोग पार हो रहे हैं। मिट्टी भरने जैसे छोटे उपाय से कुछ दिनों की राहत मिल सकती है, लेकिन यह स्थायी समाधान नहीं है। यह पुलिया किसी भी क्षण ढह सकती है और तब हादसा टालना नामुमकिन होगा। जामताड़ा की यह टूटी पुलिया प्रशासनिक लापरवाही और ग्रामीणों की मजबूरी दोनों को उजागर करती है। लोग रोज़ जान जोखिम में डालकर गुजर रहे हैं, लेकिन आवाज़ कोई नहीं उठा रहा। सवाल यही है कि क्या किसी बड़े हादसे का इंतज़ार है? कब तक यह चुप्पी बनी रहेगी और कब तक लोग मौत से खेलते रहेंगे ?


