ललितपुर
बुन्देली संस्कृति का लोकोत्सव नौरता नवे के बाद नौरता का पूजन

नेशनल प्रेस टाइम्स, ब्यूरो
ललितपुर। तहसील महरौनी अंतर्गत ग्राम कुम्हैड़ी में अविवाहित बच्चियों ने अश्वनि शुक्ल प्रतिपदा से पूरे नौ दिन तक ब्रह्ममुहूर्त में गांव की चौपालों या गांव के बड़े चबूतरों पर अविवाहित बड़ी बेटियों द्वारा सरजित एक रंग बिरंगा ऐसा संसार दिखता है जिसमें एक व्यवस्था होती है, संस्कार होते हैं। रागरंग और लोकचित्रों में बुन्देली गरिमा होती है। हमारी बेटियां एक साथ गीत संगीत, नृत्य चित्रकला और मूर्तिकलां, साफ-सफाई संस्कारों से मिश्रित लोकोत्सव नौरता मनाती है। दीवार एक विराट दैतयाकार प्रतिमा जिसका श्रृंगार चने की दाल, ज्वार के दाने, चावल, गुलाबास के फूलों से सजाया और अलंकृत किया जाता है। इसके चबूतरे की रंगोली के समान निर्मित दुदी एवं सूखे रंगों से चौक पूरा जाता है। लड़कियों की स्वर लहरी फूट पड़ती है।
नारे सुअटा, गौरा देवी क्वांरे में नेहा तोरा
बुन्देलखण्ड की मात्र कुंआरी कन्याओं के लिए आरक्षित है। इसमें देवी पार्वती की आराधना का स्वरुप कुंआरी अवस्था का ही है। ऐसी मान्यता है कि सामान्य रुप से नौरता का अर्थ एक दैत्य था (सुअटा का भूत) जो कुंआरी कन्याओं को खा जाता था। लड़कियों ने उससे प्राण बचाने के लिए माता पार्वती की आराधना नवरात्रि में की और वे सुरक्षित हो गयीं। कार्यक्रम में मुख्य रूप से रिया, राशि, नैंसी, गीता, वैष्णवी, सुजाता, बुलबुल, गौरी एवं संपूर्ण मुहल्ला की लड़कियों ने प्रतिभाग किया।



