सिंगरौली
जिले के आदिवासी गांवों में विकास की रफ्तार थमी !
वर्षों से अधूरी पुलिया का भी नहीं हो सका पूरा निर्माण

नेशनल प्रेस टाइम्स, ब्यूरो।
सिंगरौली। शासन -सत्ता के विकास के दावे जमीन पर किस तरह दम तोड़ रहे हैं, इसकी जीवंत बानिगी देखनी हो देवसर विधानसभा क्षेत्र के ग्रामीण इलाकों में पहूंच जाइए। जहां वर्षों से अधूरे पड़े निर्माण कार्य कथित विकास के दावों की पोल खोल देंगे। इसी क्रम में इस क्षेत्र एक ऐसा अधूरा पुल भी है जो16 वर्षों अपने पूर्ण होने की बाट जोह रहा है। ऐसे में सवाल तो उठता ही है कि बीते 16 साल में बदलते विधायक, बदलते अधिकारी तो दिखे ,लेकिन किसी को उस अधूरे पुल का “इंतज़ार” क्यों नहीं दिखाई दिया।
देवसर विधानसभा क्षेत्र (81) के सुदूर ग्रामीण अंचलों में आज भी लोग पक्की सड़क और पुलिया के इंतज़ार में हैं। विकास के वादों के ढेर के बीच सच्चाई यह है कि 16 वर्षों बाद भी यहां एक अधूरी पुलिया ग्रामीणों की उम्मीदों पर पत्थर बनकर खड़ी है। ग्राम पंचायत तिनगुड़ी क्षेत्र के ओबरी बड़काडोल, धन्निहवा टोला, तथा गन्नई पंचायत के खाड़ीटोला और बैरहाटोला के सैकड़ों आदिवासी परिवार हर रोज इस अधूरे निर्माण के कारण परेशान हैं
2008 में स्वीकृत, 2009 में रुका निर्माण… फिर कभी नहीं हुआ शुरू!
स्थानीय ग्रामीणों के अनुसार यह पुलिया वर्ष 2008–09 में स्वीकृत की गई थी। शुरूआत में एक महीने तक काम चला, लेकिन उसके बाद निर्माण कार्य अचानक बंद कर दिया गया। तब से लेकर आज तक — 16 साल बीत गए, पुलिया वहीं अधूरी खड़ी है। बरसात के दिनों में स्थिति और भयावह हो जाती है। पुलिया अधूरी होने के कारण पानी भर जाता है और ट्रैक्टर के अलावा कोई वाहन गुजर नहीं पाता।बच्चों को स्कूल जाने, बीमारों को अस्पताल पहुंचाने और महिलाओं को रोजमर्रा के कामों में भारी मुश्किलों का सामना करना पड़ता है।
500 मीटर की दूरी के लिए 7 किलोमीटर का चक्कर!
पुलिया निर्माण अधूरा होने से बड़काडोल से बैरहा तक पहुंचने के लिए ग्रामीणों को मात्र 500 मीटर की दूरी तय करने के लिए 7 किलोमीटर का लंबा चक्कर लगाना पड़ता है। इससे न केवल समय और श्रम का नुकसान हो रहा है, बल्कि ईंधन और आर्थिक बोझ भी ग्रामीणों पर बढ़ता जा रहा है।
ग्रामीणों का आक्रोश — “नेताओं ने किया वादा, पूरा किसी ने नहीं किया!”
ग्रामीणों का कहना है कि हर चुनाव में नेता आते हैं, वादा करते हैं, लेकिन पुलिया आज भी अधूरी है। अब तो हम उम्मीद ही छोड़ चुके हैं। उन्होंने बताया कि कई बार जनपद, पंचायत, और प्रशासनिक अधिकारियों से शिकायत की गई, लेकिन किसी ने सुध नहीं ली। प्सवाल उठता है कि आखिर 2008 में स्वीकृत पुलिया अब तक अधूरी क्यों पड़ी है? किस विभाग की लापरवाही से 5000 से अधिक आदिवासी ग्रामीण रोज परेशान हैं? क्या विकास योजनाएं सिर्फ कागज़ों पर पूरी होती हैं? ग्रामीणों ने प्रशासन से तत्काल अधूरा पुलिया निर्माण पूरा कराने की मांग की है। उनका कहना है कि यह कार्य पूरा होने से लगभग 5000 की आदिवासी आबादी को राहत मिलेगी और उनके बच्चों, छात्रों व बुजुर्गों को भी सुगम आवागमन का रास्ता मिलेगा।



