पाकुड़

राष्ट्रगीत वंदे मातरम के 150 वर्ष पूरे होने पर रेलवे मैदान पाकुड़ में किया भव्य आयोजन

A grand event was organised at Railway Ground, Pakur to mark the completion of 150 years of the national song Vande Mataram.

नेशनल प्रेस टाइम्स ब्यूरो।
पाकुड़। राष्ट्रव्यापी कार्यक्रम के तहत पाकुड़ रेलवे मैदान में राष्ट्रीय गीत वंदे मातरम के 150 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में सामूहिक वंदे मातरम का गायन समारोह का भव्य आयोजन किया गया।कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में मंडल रेल प्रबंधक पूर्व हावड़ा विशाल कपूर मौजूद रहे साथ ही अपर मंडल रेल प्रबंधक सौरीश मुखर्जी, वरिष्ठ मंडल अभियंता(समन्वय) कार्तिक सिंह,वरिष्ठ मंडल परिचालन प्रबंधक राजीव रंजन,वरिष्ठ मंडल संकेत एवं दुरसंचार अभियंता ए•के• पांडियाल,वरिष्ठ मंडलीय अभियंता(4) अनिल करवा, सहायक निर्माण प्रबंधक(टीआरडी) अजित कुमार पात्रा,स्टेशन प्रबंधक लखीराम हेंब्रम,यातायात निरीक्षक प्रवीण कुमार,नितेश कुमार राय,ईस्टर्न जोनल रेलवे पैसेंजर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष हिसाबी राय,सचिव राणा शुक्ला,ईस्टर्न रेलवे मेन्स यूनियन के अध्यक्ष अखिलेश कुमार चौबे,सचिव संजय कुमार ओझा कुमार विकास मौजूद थे। वंदे मातरम स्मरणोत्सव-सह-गायन समारोह में पाकुड़ रेलवे के पदाधिकारी व कर्मचारी सहित सैकड़ों की संख्या में आमजनों ने राष्ट्रीय का सामूहिक गायन किया।सरस्वती शिशु विद्या मंदिर पाकुड़ के भैया बहनों के द्वारा वंदे मातरम गायन से संपूर्ण स्टेशन परिसर राष्ट्रीय गीत से सराबोर हो गया,चहुंओर वंदे मातरम ही गूंज रहा था।तदोपरांत मंडल रेल प्रबंधक सहित सभी वरिय रेल पदाधिकारी और कर्मचारियों ने इंदिरा गांधी स्टेडियम नई दिल्ली में आयोजित प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी के मुख्य कार्यक्रम के संबोधन का सीधा प्रसारण रेलवे स्टेशन पाकुड़ में सुना। इस अवसर पर मंडल रेल प्रबंधक हावड़ा श्री कपुर ने कहा कि से 2025 में राष्ट्रीय गीत वंदे मातरम की 150वीं वर्षगांठ मनाई जा रही है।ऐसा माना जाता है कि बंकिम चंद्र चटर्जी द्वारा रचित हमारा राष्ट्रीय गीत वंदे मातरम 7 नवंबर 1875 को लिखा गया था। वंदे मातरम पहली बार साहित्यिक पत्रिका “बंगदर्शन” में उपन्यास आनंद मठ के एक भाग के रूप में धारावाहिक रूप में और बाद में 1882 में एक स्वतंत्र पुस्तक के रूप में प्रकाशित हुआ।उस काल में भारत बड़े सामाजिक,सांस्कृतिक और राजनीतिक परिवर्तन से गुजर रहा था, राष्ट्रीय पहचान और औपनिवेशिक शासन के प्रति प्रतिरोध की चेतना बढ़ रही थी।मातृभूमि को शक्ति,समृद्धि और दिव्यता के प्रतीक बताते हुए इस गीत ने भारत की एकता और स्वाभिमान की जागृत भावना को काव्यात्मक अभिव्यक्ति प्रदान की और यह शीघ्र ही राष्ट्र के प्रति समर्पण का एक स्थाई प्रतीक बन गया।

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