सिंगरौली
सड़क का नामोनिशान नहीं फिर भी बन गया पुल !
सिंगरौली में अजब–गजब कारनामा, सरकारी धन की खुली लूट का खेल

नेशनल प्रेस टाइम्स, ब्यूरो।
सिंगरौली। मध्यप्रदेश का सिंगरौली जिला एक बार फिर चर्चा में है—इस बार वजह है एक ऐसा “अद्भुत” निर्माण कार्य, जिसने सरकारी तंत्र की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। मामला है देवसर विकासखंड के ग्राम पंचायत जोबा का, जहाँ बिना सड़क के ही नाले पर पुलिया बनाकर लाखों की राशि का आहरण कर लिया गया।
सड़क नहीं, सिर्फ पुल! ‘डेवलपमेंट’ का नया फॉर्मूला
दियाडोल से जोवा पहुंच मार्ग का हाल ऐसा है कि वहाँ सड़क का कोई रता–पता नहीं। चारों ओर खेत, झाड़–झंखाड़ और बीच में एक धोवा नाला, जिस पर अब एक पुलिया “खड़ी” है — जो कागज़ों में तो पूर्ण बताई जा रही है, पर हकीकत में छत के बिना अधूरी और बेहद कमजोर स्थिति में है। ग्रामीणों के मुताबिक 10 और 12 एमएम के सरिए से बना यह पुल अपनी पहली बारिश में ही ढह सकता है। फिर भी जिम्मेदार अधिकारी चुप हैं, मानो सब कुछ सामान्य हो।
ग्रामीणों का आरोप ‘कागज़ों में काम पूरा, ज़मीन पर सन्नाटा’
ग्रामवासियों ने पंचायत एजेंसी पर शासकीय राशि के बंदरबांट का आरोप लगाते हुए कहा कि जोबा पंचायत में हर काम पहले फाइल में पूरा होता है, फिर नाम के लिए थोड़ा–बहुत निर्माण कर दिया जाता है। गुणवत्ता का नाम तक नहीं है।
पूर्व सरपंच देवराज सिंह ने तो यहाँ तक कहा
जब सड़क ही नहीं बनी तो पुल बनने का औचित्य क्या है? यह तो सीधा सरकारी धन की लूट है। लगता है नारा बना लिया गया है – जहाँ नाला मिले, पुल बना दो… सड़क बाद में देखी जाएगी!
जिम्मेदारों की चुप्पी और अधिकारियों की भूमिका संदिग्ध
ग्राम पंचायत में चल रहे इस गुणवत्ता–विहीन निर्माण ने उपयंत्री, एसडीओ और पंचायत एजेंसी की भूमिका पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। स्थानीय सूत्रों के अनुसार, राशि का आहरण पूरा हो चुका है, लेकिन निर्माण अधूरा और तकनीकी मानकों से कोसों दूर है। अब सवाल यह है कि क्या जिला प्रशासन, विशेष रूप से नवागत कलेक्टर, इस मामले को संज्ञान में लेंगे? या फिर यह भी फाइलों में दब जाएगा, जैसा कि कई और मामले हो चुके हैं?जोबा पंचायत में सड़क गायब, पुल अधूरा और अधिकारी मौन — यह सिर्फ एक गाँव की कहानी नहीं, बल्कि पूरे जिले के सिस्टम की तस्वीर है। सरकारी पैसों की इस “सड़कविहीन पुल नीति” पर अगर जल्द कार्रवाई नहीं हुई, तो जनता के पैसों से बनने वाली यह “विकास की दीवारें” यूं ही भ्रष्टाचार की बुनियाद में ढहती रहेंगी।



