बेतुल

बैतूल 15 वर्ष बाद भी सेनानी के नाम की बाट जो रहा है बाबू चौक

नगर पालिका उदासीन

नेशनल प्रेस टाइम्स, ब्यूरो
बैतूल। शासन-प्रशासन स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के सम्मान में सिर्फ बातें ही करता रहा है। परन्तु जमीनी हकीकत कुछ और ही है। इसका प्रमाण नपा द्वारा 15 पहले लिया गया एक प्रस्ताव है, जिस पर आज तक भी अमल नहीं हो सका है। यह प्रस्ताव शहर के एक चौक का नामकरण जिले के एक प्रमुख स्वतंत्रता संग्राम सेनानी स्वर्गीय आम्बेकर शास्त्री के नाम पर किए जाने को लेकर था। प्राप्त जानकारी के अनुसार नगर पालिका परिषद बैतूल के 11 अक्टूबर 2010 के विशेष सम्मेलन में एक महत्वपूर्ण निर्णय लिया गया था। इसके अनुसार गंज स्थित बाबू चौक का नाम जिले के प्रमुख और लोकप्रिय स्वतंत्रता संग्राम सेनानी स्वर्गीय आम्बेकर शास्त्री के नाम पर रखा जाना था। परिषद के इस सम्मेलन में न केवल चौक का नामकरण उनके नाम किए जाने का बल्कि इस चौक पर उनकी मूर्ति स्थापित किए जाने का निर्णय भी लिया गया था। उस समय नगर पालिका अध्यक्ष डॉ. राजेंद्र देशमुख थे। नगर पालिका परिषद द्वारा यह प्रस्ताव लिए जाने पर ऐसा लग रहा था कि जल्द ही इस पर अमल कर लिया जाएगा, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। आज भी यह प्रस्ताव नगर पालिका की फाइलों में ही धूल खा रहा है। इस संबंध में स्वर्गीय श्री आम्बेडकर के पोते दीपक आंबेकर नपा अधिकारियों से लेकर विधायक और सांसद से भी गुहार लगा चुके हैं, लेकिन किसी ने भी सुनवाई नहीं की। भाजपा के नेता वैसे तो स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के सम्मान की दुहाई देते नहीं थकते हैं, लेकिन यहां ऐसा लगता नहीं है। यह प्रस्ताव पारित होने के बाद से नगर पालिका बैतूल में भाजपा के एक-दो नहीं बल्कि तीन-तीन अध्यक्ष आ चुके हैं। इसके बावजूद किसी ने भी इस प्रस्ताव पर अमल करने की सुध नहीं ली। नपा के इस उपेक्षा भरे रवैये से स्वर्गीय श्री आम्बेकर के परिजनों और नागरिकों में भी बेहद दुख है।
*आजादी की लड़ाई में रही अहम भूमिका*
स्व.आम्बेकर शास्त्री का जन्म 1909 में खेड़ी सांवलीगढ़ में हुआ था। उन्होंने महात्मा गांधी के आह्वान पर 1920 में असहयोग आंदोलन, 1923 के झंड़ा सत्याग्रह, 1923 और 1940 के दिल्ली चलो आंदोलन में पैदल कूच किया। 1942 के करो या मरो तथा 1943 के सत्याग्रह में भाग लिया। इसके चलते उन्हें 5 साल, 11 माह और 18 दिन सियालकोट, गुडग़ांव, भोपाल, नागपुर और बैतूल की जेलों में रहना पड़ा। क्रांतिवीर आदिवासी विष्णुसिंग को फांसी की सजा होने पर उन्होंने अपनी जमीन, पत्नी के जेवर बेचकर प्रीवी कौंसिल में उनकी पैरवी की। भूदान यज्ञ क्रांति में भी उन्होंने हिस्सा लिया। 29 मार्च 2004 को 97 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया था।
*इनका कहना* 
तत्कालीन नपा अध्यक्ष राजेन्द्र देशमुख ने कहा कि वर्ष 2010 में इस संबंध में सर्वसम्मति से प्रस्ताव लिया गया था। साथ ही यह भी निर्णय हुआ था कि मूर्ति स्थापना के लिए अनुमति हेतु शासन को लिखा जाएं। उसके बाद किसी ने भी इस संबंध में रूचि नहीं दिखाई, जिससे आज तक न तो नामकरण हो पाया है और न ही मूर्ति स्थापित हो सकी है। हालांकि यह दोनों ही कार्य किए जाने बेहद जरुरी है।
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