सिंगरौली

सिंगरौली में आदिवासी भूमि अधिग्रहण विवाद उफान पर

आदिवासी ग्रामीणों ने कलेक्टर कार्यालय पर जताया विरोध

नेशनल प्रेस टाइम्स, ब्यूरो।
 सिंगरौली। जिले में आदिवासी समुदाय की भूमि अधिग्रहण को लेकर जारी तनाव गुरुवार को चरम पर पहुँच गया, जब किसान संघर्ष समिति सिंगरौली के नेतृत्व में बड़ी संख्या में ग्रामीण कलेक्टर कार्यालय पहुंचे। जहाँ ख़बर लिखे जाने तक उन्होंने कलेक्टर को ही ज्ञापन सौपने को लेकर प्रदर्शन करते रहे।और बताया कि आदिवासी बहुल क्षेत्रों में हो रहे कथित अवैध और जबरन भूमि अधिग्रहण पर तत्काल रोक लगाने की मांग की जा रही है। ग्रामीणों ने बताया कि कंपनी द्वारा प्रस्तावित परियोजना के लिए लगभग 1400 हेक्टेयर वन भूमि के डायवर्जन का आवेदन किया गया है। यह भूमि उन क्षेत्रों में आती है जहाँ आदिवासी परिवार पीढ़ियों से निवास कर रहे हैं और अपनी आजीविका के लिए जंगल पर निर्भर हैं। समिति का कहना है कि यह परियोजना आठ गांवों के 600 से अधिक परिवारों को सीधे प्रभावित करेगी, जिससे उनका जीवन, संस्कृति और आजीविका गंभीर खतरे में पड़ सकती है।
संवेदनशील जनजातीय समुदाय पर हो रहा सीधा असर
ग्रामीणों ने जोर देकर कहा कि यह पूरा क्षेत्र विशेष रूप से संवेदनशील जनजाति समूह (PVTG) से संबंधित है। इस समुदाय की जनसंख्या बेहद सीमित है और उनकी पारंपरिक जीवनशैली संरक्षण में विशेष संवैधानिक प्रावधान लागू होते हैं। ग्रामीणों का दावा है कि कंपनी और प्रशासन द्वारा अपनाई जा रही प्रक्रिया इनके संवैधानिक अधिकारों, विशेषकर अनुसूचित जनजाति एवं अन्य परंपरागत वन निवासी (वनाधिकार) अधिनियम, 2006 के प्रावधानों का स्पष्ट उल्लंघन है।
ग्रामसभा की अनदेखी और वनाधिकारों का हनन
किसान संघर्ष समिति ने आरोप लगाया कि ग्रामसभा की अनिवार्य स्वीकृति लिए बिना डायवर्जन की प्रक्रिया आगे बढ़ाई जा रही है। ज्ञापन में उल्लेख है कि वनाधिकार कानून के अनुसार ग्रामसभा की अनुमति के बिना किसी भी प्रकार की भूमि हस्तांतरण या परियोजना स्वीकृति अवैध मानी जाती है।
सिंगरौली पुलिस पर जबरन बेदखली के आरोप
ग्रामीणों ने यह भी दावा किया कि प्रशासनिक दबाव में पुलिस बल आदिवासी परिवारों को जबरन उनके घरों से बेदखल कर रहा है। कई जगहों पर महिलाओं और बुजुर्गों के साथ दुर्व्यवहार तथा धमकी के आरोप भी लगाए गए। ग्रामीणों ने इन कार्रवाइयों को पूरी तरह अनैतिक, असंवैधानिक और कानून के विरुद्ध बताया।
प्रदर्शन के दौरान सौंपे गए ज्ञापन में आदिवासी बहुल क्षेत्रों में भूमि अधिग्रहण की पूरी प्रक्रिया को तत्काल रोक दिये जाने, वनाधिकार कानून, 2006 एवं पंचायती राज (अनुसूचित क्षेत्रों पर विस्तार) अधिनियम (PESA) का कड़ाई से पालन सुनिश्चित करने,ग्रामीणों पर हो रहे कथित उत्पीड़न, धमकियों और दबाव की घटनाओं पर तत्काल रोक लगाने, क्षेत्र में चल रही या प्रस्तावित वन कटाई और कथित जबरन विस्थापन पर तुरंत प्रतिबंध लगाने,जो भूमि अधिग्रहण प्रक्रिया और पुलिस कार्रवाई की निष्पक्ष जाँच कर सके ऐसी प्रभावित गांवों के लिए स्वतंत्र जांच समिति गठित करने जैसी प्रमुख मांगों को रखा गया है।
कलेक्टर कार्यालय परिसर में सुबह से ही ग्रामीणों की भीड़ जुटनी शुरू हो गई थी। कई महिलाओं ने भी अपनी समस्याएँ रखते हुए कहा कि यदि यह भूमि अधिग्रहण नहीं रुका तो उनके परिवारों का अस्तित्व खतरे में पड़ जाएगा। ग्रामीणों का कहना है कि जब तक उनकी मांगों पर लिखित और ठोस कार्रवाई नहीं होती, तब तक आंदोलन जारी रहेगा। अब नजर प्रशासनिक प्रतिक्रिया और आगामी सरकारी निर्णयों पर है, जो इस पूरे विवाद के भविष्य को तय करेंगे।
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