बागपत
दो वर्ष पूर्ण होने पर एक विशेष भावनात्मक इंटरव्यू
“मेरी यात्रा संघर्ष की भी है और विश्वास की भी…”

नेशनल प्रेस टाइम्स, ब्यूरो।
रेनू शर्मा (MA., B.Ed.)
मदर मेरी स्कूल, पट्टी चौधरान बड़ौत
प्रश्न 1: दो वर्ष पूरे हो गए — इस समय अपके मन में क्या चल रहा है?
रेनू शर्मा:
जब मैं आज अपने स्कूल की इमारत, बच्चों की हंसी, और उनके माता–पिता की उम्मीदों को देखती हूँ, तो लगता है कि ईश्वर ने मेरी मेहनत रंग लाई। पिछले दो साल काफी संघर्ष भरे रहे—कभी आर्थिक संकट, कभी स्टाफ की कमी, कभी समाज की शंकाएँ… कई बार मन सचमुच टूट सा जाता था। लेकिन दिल के एक कोने से आवाज़ आती थी: “हार मत मानो रेनू, तुम्हें बच्चों का भविष्य बनाना है!”
इसी आवाज़ ने मुझे संभाला और आज जब 200 बच्चे मेरे स्कूल में पढ़ रहे हैं, तो लगता है कि हर आँसू, हर संघर्ष सार्थक हो गया।
प्रश्न 2: स्कूल शुरू करने का विचार कैसे आया?
रेनू शर्मा:
मैंने लगभग तीन साल तक किराए की बिल्डिंग में बच्चों को पढ़ाया। वहाँ बच्चों से मिलता प्यार और माता-पिता का विश्वास मुझे एहसास दिलाते थे कि शिक्षा कोई नौकरी नहीं, यह सेवा है। यही सोच मन में बीज की तरह पनपती रही।
एक दिन लगा—अगर दूसरों के संस्थान में पढ़ाकर इतना संतोष मिलता है, तो अपनी सोच, अपने संस्कार, अपनी शिक्षण पद्धति से बच्चों को तैयार करूं तो कितना अच्छा हो!
बस, वहीं से मेरी यात्रा शुरू हुई।
प्रश्न 3: क्या शुरुआत आसान थी?
रेनू शर्मा:
बिल्कुल नहीं!
सबसे कठिन समय वही होता है जब हम सपना देखते हैं लेकिन संसाधन कम होते हैं।
शुरुआत में कई लोगों ने कहा, “आजकल स्कूल खोलना आसान नहीं… चल पाएगा कि नहीं?”
उनके संदेह मेरे दिल को चोट करते थे, पर अंदर से एक ताकत भी जागती थी कि मैं कर सकती हूँ।
धीरे-धीरे बच्चों की संख्या बढ़ने लगी। माता-पिता ने भरोसा दिखाया। कुछ लोग जो पहले शक कर रहे थे, आज वही सबसे आगे होकर स्कूल की तारीफ़ करते हैं।
प्रश्न 4: इस सफर में परिवार का योगदान कैसा रहा?
रेनू शर्मा:
आज जो भी हूँ, अपने परिवार—खासकर पति और सास—की वजह से हूँ।
कई रातें थीं जब मैं तनाव में घर आती, रो देती, हार मानने जैसा लगता। पर मुझे मेरी सास कहतीं,
“डर मत बेटी, तेरी मेहनत एक दिन जरूर रंग लाएगी।”
मेरे पति हर कदम पर मेरे साथ खड़े रहे—कागज़ी काम हो, स्कूल की छोटी–बड़ी जरूरतें हों, या कोई मानसिक तनाव… उन्होंने कभी मुझे अकेला नहीं छोड़ा।
पूरे परिवार का आत्मिक योगदान मेरी असली पूँजी है।
प्रश्न 5: जब आज 200 बच्चों को पढ़ते देखती हैं, क्या महसूस होता है?
रेनू शर्मा:
मेरी आँखें हर दिन नम हो जाती हैं।
कई बार जब बच्चे सुबह “गुड मॉर्निंग मैम” कहते हुए दौड़कर आते हैं, मुझे अपने बीते हुए संघर्ष याद आ जाते हैं।
पहले दिन की वह छोटी-सी कक्षा, दो–तीन बच्चे, और मन में हजार डर… आज वही स्कूल 200 परिवारों की उम्मीद बन चुका है।
यह सोचकर दिल भर आता है कि मेरी मेहनत किसी एक बच्चे की जिंदगी बदल सकती है।
प्रश्न 6: किन मूल्यों पर आपका स्कूल चल रहा है?
रेनू Sharma:
मेरे लिए शिक्षा सिर्फ किताबों का ज्ञान नहीं है।
मैं चाहती हूँ—
बच्चे संस्कार सीखें
माता–पिता का सम्मान करें
समाज के प्रति जिम्मेदार बनें
और सबसे ज़रूरी—अपने अंदर आत्मविश्वास जगाएँ
मदर मेरी कॉन्वेंट स्कूल सिर्फ पढ़ाई का स्थान नहीं, बल्कि बच्चों के संपूर्ण विकास का केंद्र है।
प्रश्न 7: आगे की क्या योजनाएँ हैं?
रेनू शर्मा:
स्कूल को और बड़ा, और बेहतर बनाना मेरा सपना है।
मैं चाहती हूँ कि ग्रामीण क्षेत्र के बच्चों को शहर जैसी शिक्षा मिले।
भविष्य में स्मार्ट क्लास, स्पोर्ट्स सुविधाएँ और स्किल डेवलपमेंट प्रोग्राम शुरू करने की योजना है, ताकि बच्चे सिर्फ पढ़ने में नहीं, बल्कि जीवन के हर क्षेत्र में आगे बढ़ें।
आख़िर में आप माता-पिता और समाज को क्या संदेश देना चाहेंगी?
रेनू शर्मा:
मेरी एक ही विनती है—
बच्चों पर विश्वास रखिए, और शिक्षकों पर भी।
बच्चे वही बनते हैं, जिस विश्वास से उन्हें सींचा जाता है।
आज मेरा स्कूल यदि सफल है तो उसकी जड़ में माता–पिता का सहयोग और उनका विश्वास है।
मैं वादा करती हूँ कि हर बच्चे को मैं अपने बच्चे की तरह आगे बढ़ाऊँगी।
रेनू शर्मा की यह यात्रा सिर्फ एक स्कूल खोलने की कहानी नहीं, बल्कि साहस, आत्मविश्वास और परिवार के सहयोग से सपनों को सच करने का प्रेरक उदाहरण है।
उनकी आँखों की चमक, आवाज़ की दृढ़ता और दिल की सच्चाई बता देती है—
“जहाँ इरादा साफ हो, वहाँ सफर हमेशा सफल होता है।”



