गाजियाबाद

डिजिटल इंडिया के दौर में ग्राम पंचायत सचिव अब भी साइकिल एलाउंस पर निर्भर: काम बढ़े, साधन नहीं

नेशनल प्रेस टाइम्स, ब्यूरो
 लोनी, गाज़ियाबाद : सरकार जहां “डिजिटल इंडिया” और “स्मार्ट विलेज” की बात कर रही है, वहीं ग्रामीण प्रशासन की असल तस्वीर इससे अलग दिखाई देती है। गांवों के विकास का बड़ा हिस्सा आज भी ग्राम पंचायत सचिव की साइकिल एलाउंस और सीमित संसाधनों पर निर्भर है।
सरकारी दावों में ऑनलाइन सिस्टम, पेपरलेस कार्य और त्वरित सेवा की बातें हैं, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि सचिव एक हाथ में फाइलें, दूसरे में मोबाइल और पैरों में पुरानी साइकिल एलाउंस के भरोसे काम कर रहे हैं।
एक पद, दर्जनों जिम्मेदारियां — सचिव बने “चलता-फिरता मल्टी डिपार्टमेंट”
ग्राम पंचायत सचिव को कागज़ों में पंचायत प्रशासन की रीढ़ माना जाता है, लेकिन वास्तविकता में वह कई विभागों का संयुक्त स्टाफ बन चुका है।
सचिवों को इन विभागों के कार्य भी करने पड़ रहे हैं:
कृषि विभाग: एग्री–स्टेक सर्वे, खरीफ–रबी रिपोर्ट
पशुपालन विभाग: गौवंश सर्वे और आवारा पशु प्रबंधन
समाज कल्याण विभाग: पेंशन सत्यापन
स्वास्थ्य विभाग: जन्म-मृत्यु प्रमाणपत्र
राजस्व विभाग: फैमिली आईडी सत्यापन
शिक्षा विभाग: विद्यालयों की निगरानी व मरम्मत रिपोर्ट
विकास विभाग: तालाब निरीक्षण, पंचायत भवन कार्य
गांव वालों का कहना है—
 “सरकारी नौकरी में मल्टीटास्किंग का अवॉर्ड देना हो तो ग्राम सचिव को मिलना चाहिए।”
डिजिटल सिस्टम की चुनौतियां: सर्वर डाउन, OTP फेल और बढ़ती पेंडेंसी
सरकार का दावा है कि काम ऑनलाइन हो रहा है, लेकिन सचिवों का अनुभव विपरीत है।
कभी नेटवर्क नहीं मिलता
कभी पोर्टल नहीं खुलता
लॉगिन हो जाए तो OTP नहीं आता
OTP आ जाए तो सर्वर बंद हो जाता है
सचिवों का तंज—
 “सरकार काम ऑनलाइन कर रही है और हम अब भी ऑफलाइन पैडल मोड में काम जमा कर रहे हैं।”
अधिकारियों का दबाव और ग्रामीणों की उम्मीदें
अधिकारियों की अपेक्षाएं और ग्रामवासियों की मांगें दोनों तेजी से बढ़ रही हैं।
“फाइल आज ही दो”, शिकायत का निस्तारण करो, रिपोर्ट तुरंत भेजो, सरकारी योजनाओं के कार्य क्रम में भीड़ जुटाओ, सामूहिक विवाह में लक्ष्य पूरा करो, मनरेगा में मजदूर लगाओ
आदि काम करने जरुरी है
कुछ अधिकारी तो सचिवों को ऐसे आदेश देते हैं, मानो वह सामान्य कर्मचारी नहीं बल्कि किसी अंतरिक्ष मिशन के वैज्ञानिक हों।
अत्यधिक कार्यभार के बीच आंदोलन और मानसिक दबाव
फार्मर रजिस्ट्री, आयुष्मान कार्ड, पराली प्रबंधन, सूर्यघर योजना, जलस्रोत गणना और आवारा पशु पकड़ने जैसे कार्य सचिवों के ऊपर बिना संसाधन के डाले जा रहे हैं।
इन कार्यों के नियमों की स्पष्ट जानकारी न होने के बावजूद सचिव केवल नौकरी बचाने के लिए तेजी से काम कर रहे हैं, जिससे कई बार केवल कागजी खानापूर्ति होती है।
स्वास्थ्य समस्याओं, तनाव और मानसिक दबाव के मामले लगातार बढ़ रहे हैं।
अब  सवाल उठता है कि
 अकेला सचिव इतने विभागों और योजनाओं के क्रियान्वयन की जिम्मेदारी कैसे निभाए?
 क्या इतने बड़े सिस्टम का भार एक कर्मचारी पर डालना न्यायसंगत है?
क्या योजनाओं का सही क्रियान्वयन हो भी रहा है या सिर्फ रिपोर्टें कागजों में पूरी की जा रही हैं
ग्रामवासियों का मानना है—
“जिस दिन सचिव बाइक पर आएंगे और पोर्टल एक बार में खुलेगा, उसी दिन गांव वाकई आधुनिक कहलाएगा।”
सिस्टम उड़ रहा है, नीतियां आगे बढ़ रही हैं, लेकिन ग्राम पंचायत सचिव अब भी जिम्मेदारियों के बोझ और सीमित साधनों के साथ साइकिल एलाउंस पर संघर्ष कर रहे हैं
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