जालौन
लाल सोने की भूख में बेतवा नदी का सीना चीर रहा कहटा हमीरपुर खण्ड 4 का घाट संचालक
रात-दिन गरज रही पोकलेन जलधारा रोक कर किया जा रहा अवैध खनन

बेतवा नदी के सीने पर सांप की तरह लौटें लगा लगाकर अवैध खनन करने में लगा घाट संचालक
नेशनल प्रेस टाइम्स, ब्यूरो।
लाल सोना कही जाने वाली बालू की अंधी भूख ने बेतवा नदी को मौत के मुहाने पर ला खड़ा किया है। कहटा हमीरपुर स्थित गाटा संख्या 1064, खंड संख्या 4 में सक्षम कांट्रेक्टर एंड सप्लायर के नाम पर चल रहा खनन अब व्यवसाय नहीं बल्कि खुलेआम पर्यावरण हत्या का रूप ले चुका है। पट्टाधारक देवेंद्र कुमार गुप्ता पुत्र शिवकुमार गुप्ता निवासी 160 ओम शांति नगर थाना कोतवाली जिला झांसी द्वारा बेतवा नदी के सीने पर दिन-रात सांप की तरह लोट लगा रहा है और पोकलेन मशीनें दौड़ाई जा रही हैं। नदी की प्राकृतिक जलधारा को रोककर अस्थायी बांध बनाए गए हैं जैसे भगवान राम जी ने सीता जी को लंका से लाने के लिए पुल बनाया था वैसे ही घाट संचालक अस्थाई पुल बनाए हुए है और भारी मशीनों से बालू का अंधाधुंध दोहन किया जा रहा है। यह कृत्य न केवल उत्तर प्रदेश खनिज नियमावली 1963 की सीधी अवहेलना है बल्कि राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) की खुली धज्जियां उड़ाने जैसा है जिसमें स्पष्ट किया गया है कि किसी भी नदी की जलधारा को अवरुद्ध कर खनन करना अपराध है। स्थानीय ग्रामीणों का आरोप है कि जैसे ही शाम ढलती है खनन माफिया का असली खेल शुरू हो जाता है। रात के अंधेरे में पोकलेन मशीनें गरजती हैं ट्रकों की कतारें लगती हैं और बेतवा से बालू लूटकर करोड़ों की कमाई की जा रही है। इस अवैध खनन से नदी का तल गहराता जा रहा है किनारों का कटाव तेज हो गया है और आसपास के गांवों में भूजल संकट गहराने लगा है। पर्यावरण विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इसी तरह नदी की धारा रोककर बांध बनाए जाते रहे तो आने वाले समय में बेतवा का अस्तित्व ही खतरे में पड़ सकता है। बाढ़,सूखा और कृषि भूमि के नष्ट होने जैसी भयावह स्थितियां उत्पन्न होना तय है। इसके बावजूद जिम्मेदार विभागों की चुप्पी कई सवाल खड़े कर रही है। ग्रामीणों का कहना है कि पट्टाधारक को ऊंचे रसूख का संरक्षण प्राप्त है इसी वजह से जिला प्रशासन खनन विभाग और पर्यावरण से जुड़े अधिकारी आंखें मूंदे बैठे हैं। शिकायतें दर्ज होने के बाद भी न तो पोकलेन मशीनें जब्त हुईं और न ही खनन पर कोई ठोस रोक लगी। बेतवा नदी केवल बालू का भंडार नहीं बल्कि हजारों लोगों की जीवनरेखा है। उसकी हत्या कर कुछ लोगों की तिजोरियां भरी जा रही हैं। सवाल यह नहीं है कि अवैध खनन हो रहा है या नहीं सवाल यह है कि आखिर कब तक कानून की किताबें कागजों में बंद रहेंगी और कब बेतवा को लूटने वालों पर कार्रवाई होगी? क्या प्रशासन किसी बड़ी दुर्घटना या पर्यावरणीय तबाही का इंतजार कर रहा है? अब जनपद की जनता जवाब चाहती है—कब रुकेगा यह खनन माफियाओं का खेल और कब बेतवा को उसका अधिकार मिलेगा?



