MESA के बिना PESA अधूरा, अब निर्णायक संघर्ष होगा – विजय शंकर नायक
PESA is incomplete without MESA, now there will be a decisive struggle - Vijay Shankar Nayak

नेशनल प्रेस टाइम्स ब्यूरो।
रांची: अनुसूचित क्षेत्रों में आदिवासी स्वशासन की सुरक्षा और संवैधानिक अधिकारों की पूर्ण बहाली के बिना झारखंड का समग्र विकास संभव नहीं है। केवल PESA Act, 1996 को कागज़ी रूप से लागू कर देने से ग्रामसभा, जल–जंगल–जमीन और पारंपरिक स्वशासन की वास्तविक रक्षा नहीं हो सकती, जब तक कि MESA (Municipalities Extension to Scheduled Areas) को भी समान रूप से लागू नहीं किया जाता। उक्त बातें आदिवासी मूलवासी जनाधिकार मंच के केंद्रीय उपाध्यक्ष एवं पूर्व विधायक प्रत्याशी विजय शंकर नायक ने अपनी प्रतिक्रिया में कहीं। उन्होंने कहा कि झारखंड में PESA लागू होने की घोषणा भले ही देर से हुई हो, लेकिन यह लगातार जनदबाव, न्यायालय की कठोर टिप्पणी और वर्षों से चल रहे जनआंदोलन की जीत है।
विजय शंकर नायक ने कहा कि भाजपा की 14 वर्षों की उदासीनता अब पूरी तरह उजागर हो चुकी है। झारखंड में लंबे समय तक सत्ता में रहने के बावजूद भाजपा ने PESA कानून को लागू नहीं किया, बल्कि जानबूझकर इसे रोके रखा। यह न केवल संविधान की भावना के खिलाफ था, बल्कि आदिवासी समाज, ग्रामसभा और उनके अधिकारों के प्रति विरोधी रवैये को भी दर्शाता है। उन्होंने कहा कि आदिवासी स्वशासन, ग्रामसभा की सर्वोच्चता और प्राकृतिक संसाधनों पर समुदाय के अधिकारों की लड़ाई अब निर्णायक मोड़ पर पहुँच चुकी है। आदिवासी मूलवासी जनाधिकार मंच द्वारा वर्षों से किए गए जनसंघर्ष, नागरिक दबाव और उच्च न्यायालय के हस्तक्षेप से अब PESA के क्रियान्वयन की प्रक्रिया मजबूत हुई है। उन्होंने यह भी कहा कि जिन अधिकारों को भाजपा सरकारों ने 14 वर्षों तक रोके रखा, आज उनके लिए संघर्ष करना पड़ा। नायक ने आरोप लगाया कि भाजपा शासनकाल में ग्रामसभा के अधिकारों की अनदेखी की गई, पाँचवीं अनुसूची की भावना को कमजोर किया गया और जल–जंगल–जमीन पर आदिवासी समुदाय के अधिकारों को सम्मान नहीं दिया गया। उन्होंने कहा कि भाजपा को आदिवासी समाज से नैतिक रूप से माफी मांगनी चाहिए।
सरकार को चेतावनी देते हुए विजय शंकर नायक ने कहा कि PESA केवल एक कानून नहीं, बल्कि आदिवासी–मूलवासी समाज की अस्मिता और अस्तित्व की रक्षा का माध्यम है। ग्रामसभा को सशक्त करना लोकतंत्र की जड़ों को मजबूत करता है। उन्होंने सरकार से मांग की कि PESA को किसी भी दबाव में कमजोर न किया जाए और शीघ्र ही MESA बिल पारित करने की दिशा में ठोस एवं सकारात्मक पहल की जाए। आदिवासी–मूलवासी विरोधी नीतियों के खिलाफ संघर्ष आगे भी जारी रहेगा।



