गाजियाबाद
लोनी का दिल्ली–गंगोत्री मार्ग: विकास के दावों में दफन एक सड़क

नेशनल प्रेस टाइम्स, ब्यूरो
लोनी गाजियाबाद : लोनी का दिल्ली–सहारनपुर (गंगोत्री) मार्ग अब सड़क नहीं, बल्कि जनप्रतिनिधियों के खोखले वादों और प्रशासनिक नाकामी का स्थायी पोस्टर बन चुका है। जिस रास्ते से होकर राजधानी दिल्ली, हरिद्वार और गंगोत्री जैसे धार्मिक व व्यावसायिक केंद्र जुड़े हैं, वही लोनी क्षेत्र में स्थित मार्ग आज खुद मोक्ष की कामना करता दिख रहा है।
स्थिति यह है कि यहां सड़क खोजने निकलें तो पहले गड्ढों से अनुमति लेनी पड़ती है। जनता पूछ रही है—यह सड़क है या किसी असफल सरकारी योजना का लाइव डेमो?
बरसात में यह मार्ग जलभराव का उत्कृष्ट उदाहरण बन जाता है, जहां वाहन नहीं, बल्कि नाव चलाने की संभावना अधिक रहती है। गर्मी आते ही यही सड़क धूल का बादल उड़ाकर साबित कर देती है कि प्रशासन ने पर्यावरण प्रदूषण को बढ़ावा देने में भी कोई कोर कसर नहीं छोड़ी। दो मौसम, एक सड़क और सौ फीसदी अव्यवस्था। इसे ही शायद मल्टी-डायमेंशनल डेवलपमेंट कहा जाता है।
जनप्रतिनिधि हर चुनाव में इसी सड़क पर खड़े होकर विकास की तस्वीरें खींचवाते हैं, लेकिन चुनाव के बाद यही सड़क उनके एजेंडे से उसी तरह गायब हो जाती है, जैसे 32 करोड़ रुपये की स्वीकृत मरम्मत राशि फाइलों में। सवाल सीधा है। पैसा सड़क पर कब लगेगा या किसी और “मार्ग” पर मोड़ दिया गया?
दिल्ली से सहारनपुर, हरिद्वार और गंगोत्री को जोड़ने वाला यह मुख्य मार्ग भारी वाहनों के दबाव में रोज़ कराहता है, लेकिन PWD और जिला प्रशासन शायद इस कराह को व्हाइट नॉइज़ मानकर अनसुना कर देते हैं। सड़क के किनारे अवैध अतिक्रमण बढ़ते जा रहे हैं, मानो यह सब प्रशासन की मौन स्वीकृति से चल रहा कोई स्थायी प्रयोग हो।
सबसे दिलचस्प बात यह है कि दुर्घटनाओं, जाम, धूल और जलभराव के बावजूद जिम्मेदारों के चेहरे पर चिंता की एक भी लकीर नहीं दिखाई दिखती। लगता है संवेदनहीनता अब महज़ आदत नहीं, बल्कि सेवा शर्तों में शामिल अनिवार्य योग्यता बन चुकी है।
जनता के तंज और व्यंग्य अब सड़कों से उठकर चाय की दुकानों और सोशल मीडिया तक पहुंच चुके हैं, लेकिन प्रशासन अब भी उसी चिकने घड़े की भूमिका में है, जिस पर न सवाल टिकते हैं, न शर्म फिसलने से रुकती है।
लोनी की यह सड़क आज एक कड़वा सच बयान कर रही है। यहां विकास भाषणों में होता है, बजट काग़ज़ों में बहता है और सड़क… सड़क बस भुगतती है।
अब सवाल यह नहीं कि सड़क कब बनेगी, सवाल यह है कि जवाबदेही की मरम्मत कब होगी?



