ललितपुर
विजयादशमी अन्याय, विषमता और दरिद्रता रूपी दशानन के अंत का संकल्प दिवस : सिद्धार्थ शर्मा
रामराज्य की परिकल्पना में निहित है समानता, सद्भाव और सर्वजन सुखाय का संदेश

नेशनल प्रेस टाइम्स, ब्यूरो।
ललितपुर। स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तम्भकार सिद्धार्थ शर्मा ने विजयादशमी के अवसर पर समाज को अन्याय, अनीति, शोषण, आतंक और सामाजिक विषमता के विरुद्ध संकल्प लेने का संदेश दिया है। उन्होंने कहा कि विजयादशमी केवल रावण-दहन का पर्व नहीं है, बल्कि यह बुराइयों के अंत और एक बेहतर, समतामूलक समाज के निर्माण का संकल्प दिवस भी है। सिद्धार्थ शर्मा ने कहा कि गोस्वामी तुलसीदास की रामकथा में केवल धार्मिक आस्था ही नहीं, बल्कि विद्रोह, सामाजिक परिवर्तन और आदर्श व्यवस्था की परिकल्पना का स्वर भी समाहित है। तुलसीदास द्वारा वर्णित रामराज्य ऐसा समाज है, जहां किसी के भीतर हीनता का भाव न हो, कोई अज्ञानता के अंधकार में न रहे और सभी मनुष्य आपसी प्रेम, सद्भाव तथा समानता के साथ जीवन व्यतीत करें। उन्होंने रामचरितमानस की चौपाई सब नर करहिं परस्पर प्रीती, राम प्रताप विषमता खोई। का उल्लेख करते हुए कहा कि रामराज्य की मूल भावना समाज में व्याप्त भेदभाव और विषमता को समाप्त कर आपसी प्रेम एवं समानता स्थापित करना है। यह संदेश आज भी उतना ही प्रासंगिक है, जितना रामकथा के समय था। उन्होंने कहा कि विजयादशमी पर रावण के पुतले का दहन करने के साथ-साथ समाज में व्याप्त बुराइयों को समाप्त करने का संकल्प लेना भी आवश्यक है। अन्याय, शोषण, आतंक, अनीति और सामाजिक भेदभाव के साथ-साथ दरिद्रता रूपी दशानन का अंत करना समय की महत्वपूर्ण आवश्यकता है। जब तक समाज का प्रत्येक व्यक्ति सम्मानपूर्वक जीवन जीने के अवसर से वंचित रहेगा, तब तक आदर्श समाज की परिकल्पना पूरी नहीं हो सकती। सिद्धार्थ शर्मा ने आह्वान किया कि इस विजयादशमी पर प्रत्येक व्यक्ति अपने भीतर की बुराइयों को दूर करने के साथ समाज में समानता, सद्भाव और मानवीय संवेदनाओं को मजबूत करने का संकल्प ले। उन्होंने कहा कि अन्याय और विषमता की राख पर समानता, सामाजिक समरसता तथा सर्वजन सुखाय की भावना से परिपूर्ण रामराज्य की फसल तभी लहलहा सकेगी, जब समाज का हर वर्ग विकास और सम्मान के समान अवसर प्राप्त करेगा।



