बुंदेलखंड में मां भवानी की अनूठी साधना

नेशनल प्रेस टाइम्स, ब्यूरो।
छतरपुर मध्य प्रदेश : नौ दिन तक अंधेरी कोठरी में 24 घंटे देसी घी की अखंड ज्योति… बिना सूर्य की रोशनी और बाहरी हवा के लहलहाते जवारे, और नवमी के दिन गालों में लोहे के सांग छिदवाकर मां की भक्ति में लीन श्रद्धालु।
जी हां, बुंदेलखंड में मां भवानी की आराधना का यह अनूठा स्वरूप आस्था और परंपरा की ऐसी तस्वीर पेश करता है, जिसे देखकर हर कोई हैरान रह जाता है। यहां नवरात्रि सिर्फ पूजा-पाठ का पर्व नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही कठिन साधना और अटूट विश्वास का प्रतीक है। छतरपुर जिले के लवकुशनगर स्थित बड़ी भवानी मंदिर में आज भी इस परंपरा का निर्वहन पूरी श्रद्धा के साथ किया जाता है।
यूं तो देशभर में शारदीय नवरात्रि के दौरान जगह-जगह देवी प्रतिमाएं स्थापित कर नौ दिनों तक मां दुर्गा की आराधना की जाती है, लेकिन बुंदेलखंड में चैत्र और शारदीय, दोनों नवरात्रियों में देवी उपासना का अंदाज कुछ अलग ही है। यहां श्रद्धालु माता के दिवाले रखवाते हैं, जिनमें जौ बोए जाते हैं। इन जवारों को मां भगवती का स्वरूप मानकर उनकी पूजा-अर्चना की जाती है। इस पूरी साधना के लिए पंडा नियुक्त किए जाते हैं, जो नौ दिनों तक कठिन नियमों का पालन करते हुए जवारों की सेवा करते हैं। मान्यता के अनुसार, पंडा दिनभर में केवल एक बार फलाहार करते हैं और दिवालों में 24 घंटे देसी घी की अखंड ज्योति प्रज्वलित रहती है।
इस परंपरा की सबसे खास बात है जवारों की साधना। एक छोटी-सी कोठरी में जौ बोए जाते हैं, जहां नौ दिनों तक न सूर्य की सीधी रोशनी पहुंचती है और न ही बाहर की हवा। इसके बावजूद नौवें दिन तक जवारे लगभग एक फीट तक बढ़ जाते हैं। श्रद्धालु इसे मां भवानी की कृपा और चमत्कार के रूप में देखते हैं। मान्यता है कि भगवान श्रीराम के नवमी तिथि पर जन्म से जुड़ी परंपरा तभी से चली आ रही है। हालांकि, इस मान्यता के ऐतिहासिक आधार की स्वतंत्र पुष्टि नहीं है, लेकिन बुंदेलखंड में आज भी श्रद्धालु इस परंपरा को पूरी आस्था और उत्साह के साथ निभाते हैं।
बैठकी, पंचमी और अष्टमी की रात दिवालों में देवी भजन और कीर्तन होते हैं। अष्टमी पर हवन-पूजन के साथ साधना अपने विशेष पड़ाव पर पहुंचती है। फिर आती है नवमी, जब जवारों की भव्य शोभायात्रा निकाली जाती है। सिर पर जवारे रखकर चलतीं बच्चियां, युवतियाँ ढोल-नगाड़ों की गूंज, देवी भजनों की धुन और मां के जयकारे,पूरा माहौल भक्तिमय हो उठता है। इसी दौरान कुछ श्रद्धालु अपनी मनोकामना पूरी होने पर गालों में लोहे के सांग छिदवाकर मां के प्रति अपनी श्रद्धा प्रकट करते हैं। सांग धारण किए भक्त पैदल चलते हैं और भजनों पर झूमते नजर आते हैं। श्रद्धालु इस अनुष्ठान को मां की कृपा से जोड़कर देखते हैं।
इस परंपरा से जुड़ा एक और पहलू लोगों को आकर्षित करता है। श्रद्धालुओं के अनुसार, सांग निकालने के बाद गाल पर मां की आरती की भभूत और देसी घी लगाया जाता है। उनका मानना है कि घाव का निशान नहीं रहता और यह मां भवानी की कृपा है। आस्था से जुड़ी इस परंपरा के बीच बड़ी भवानी मंदिर में पीढ़ियों से पूजा-अर्चना करने वाला एक परिवार आज भी साधना की इस विरासत को आगे बढ़ा रहा है।
लवकुशनगर स्थित बड़ी भवानी मंदिर के 75 वर्षीय पंडा-पुजारी बाला प्रसाद माली बताते हैं कि उनका परिवार तीन पीढ़ियों से मां बड़ी भवानी की सेवा और पूजा-अर्चना करता आ रहा है। उम्र के इस पड़ाव पर भी वे स्वयं दिवाले में पंडा बनकर नौ दिनों तक कठिन साधना करते हैं और जवारों की सेवा में जुटे रहते हैं। उनके लिए यह केवल पूजा-पाठ नहीं, बल्कि पूर्वजों से मिली परंपरा और मां के प्रति अटूट समर्पण है।
बुंदेलखंड की यह परंपरा बताती है कि आस्था केवल मंदिरों की चौखट तक सीमित नहीं होती, बल्कि पीढ़ियों की साधना, लोक संस्कृति और जनविश्वास में भी जीवित रहती है। नौ दिनों तक जलती अखंड ज्योति, अंधेरी कोठरी में लहलहाते जवारे और नवमी की भव्य शोभायात्रा ये सभी दृश्य बड़ी भवानी के भक्तों की गहरी श्रद्धा को बयां करते हैं।
यही बुंदेलखंड की पहचान है, जहां परंपराएं आज भी जीवंत हैं।



