मुरादाबाद

मुरादाबाद की दस्तकारी पर विदेशी चोट: ट्रंप की टैरिफ नीति से कारीगरों की रोज़ी पर संकट

नेशनल प्रेस टाइम्स, ब्यूरो
मुरादाबाद। पीतल लकड़ी और कांच से बने मुरादाबाद के खूबसूरत उत्पाद दशकों से अमेरिका के बाजारों में छाए रहे हैं। लेकिन अब यही व्यापार आज से भारी शुल्क के बोझ तले दबने वाला है।मुरादाबाद की गलियों में गूंजती धातु की ठक-ठक, अब अनिश्चितता की चुप्पी में बदलती दिख रही है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा भारत के खिलाफ 25 प्रतिशत टैरिफ लगाने की घोषणा ने यहां के हस्तशिल्प उद्योग की नींव हिला दी है।
कारीगरों की चिंता बढ़ी
पीतल लकड़ी और कांच से बने मुरादाबाद के खूबसूरत उत्पाद दशकों से अमेरिका के बाजारों में छाए रहे हैं। लेकिन अब यही व्यापार एक अगस्त से भारी शुल्क के बोझ तले दबने वाला है। अमेरिका, जहां से मुरादाबाद को हर साल लगभग 5,500 करोड़ रुपये का ऑर्डर मिलता है, वहां अब भारतीय उत्पाद महंगे पड़ेंगे और यही बढ़ती कीमतें खरीदारों को पीछे हटा सकती हैं। मुरादाबाद की शिल्प संस्कृति का जीवन उसके हज़ारों कारीगर हैं वे जो पीढ़ियों से अपने हुनर को जीवित रखे हुए हैं। लेकिन अब उन्हें डर है कि कहीं ये हुनर भूख में न बदल जाए। “अगर ऑर्डर घटे तो काम कैसे मिलेगा? कई लोग पहले ही मुश्किल में हैं” यह कहना है जिगर अली का, जो 18 साल से पीतल के बर्तन तराश रहे हैं। वही निर्यातकों का कहना है कि यह टैरिफ सिर्फ भारत ही नहीं, अमेरिका के खुद के बाजार को भी प्रभावित करेगा, क्योंकि मुरादाबाद के उत्पादों की खासियत और गुणवत्ता का कोई सस्ता विकल्प अभी वैश्विक स्तर पर मौजूद नहीं है। फिर भी, यदि कीमतें बढ़ती हैं तो अमेरिकी ग्राहक वियतनाम या चीन जैसे देशों की ओर रुख कर सकते हैं।
सरकार से राहत की उम्मीद
व्यापार मंडलों और निर्यात संघों ने केंद्र सरकार से आग्रह किया है कि वे अमेरिका से राजनयिक स्तर पर बातचीत कर इस निर्णय को पलटवाने का प्रयास करें। साथ ही, स्थानीय स्तर पर कारीगरों के लिए राहत पैकेज की भी मांग उठने लगी है। मुरादाबाद का हस्तशिल्प उद्योग सिर्फ व्यापार नहीं, एक सांस्कृतिक विरासत है। ट्रंप की टैरिफ नीति इस विरासत को आर्थिक बोझ तले दबा सकती है। सवाल यह है कि क्या सरकार समय रहते कदम उठाएगी, या फिर कारीगरों के हथौड़े थम जाएंगे?
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