
नेशनल प्रेस टाइम्स, ब्यूरो
गोड्डा : जीवन जब हर मोड़ पर परीक्षा ले, तो कुछ लोग टूट जाते हैं और कुछ लोग इतिहास रचते हैं। शिवा उर्फ शिवलाल उर्फ शिवचरण मांझी ने कठिनाइयों को चुनौती दी, असफलताओं को सीढ़ी बनाया और अंततः ‘दिशोम गुरु’ शिबू सोरेन बनकर एक युग का निर्माण कर दिया।राजनीति की शुरुआत उनके लिए आसान नहीं रही। गांव के बरलंगा प्रखंड से मुखिया का चुनाव लड़ा और हार गए। 1972 में झापा (जरीडीह विधानसभा) से पहली बार विधानसभा पहुंचने का सपना देखा पर वो भी अधूरा रह गया। 1977 में टुंडी से विनोद बिहारी महतो से राजनीतिक मतभेद के कारण चुनौती और बढ़ गई और फिर से हार मिली। लेकिन वो न रुके, न झुके। हर हार के बाद वो और मजबूत हुए। हर ठोकर ने उन्हें आदिवासी चेतना का शिल्पकार बना दिया। झारखंड के महाजनी शोषण के खिलाफ जब उन्होंने बिगुल फूंका, तो न सिर्फ जेल गए, बल्कि आंदोलन की लौ संथाल से होते हुए पूरे झारखंड में जल उठी। आख़िरकार, 1980 में उनकी आवाज़ दिल्ली तक पहुंची, वे पहली बार लोकसभा पहुंचे।इसके बाद जो हुआ, वह इतिहास है.. झारखंड आंदोलन की धुरी, आदिवासी स्वाभिमान की पहचान और शोषितों के सबसे बुलंद स्वर.. दिशोम गुरु। शिबू सोरेन का जीवन बताता है कि असफलताएं अंत नहीं, बल्कि आत्मविश्वास और संघर्ष से भरी नई शुरुआत होती हैं।



