
नेशनल प्रेस टाइम्स, ब्यूरो
बागपत। “मां का प्यार… शब्दों में नहीं समाया जा सकता। वह अपनी संतान की सलामती के लिए न जाने कितने व्रत-उपवास और तप करती है। ऐसा ही एक पवित्र व्रत है — अहोई अष्टमी… जिसे हर साल कार्तिक मास की कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को महिलाएं बड़ी श्रद्धा और भावनाओं से करती हैं।
कहते हैं — इस व्रत की शक्ति इतनी गहरी है कि यह संतानों के दीर्घायु, सुख-समृद्धि और रक्षा का अद्भुत वरदान देती है। मां दिन भर निर्जला उपवास रखती है, शाम को अहोई माता की पूजा करती है, तारे निकलने के बाद जल ग्रहण करती है। लेकिन यह व्रत केवल एक परंपरा नहीं… ये मां के हृदय की वो मूक प्रार्थना है जो भगवान तक सीधी पहुंचती है।
मान्यता के अनुसार — बहुत समय पहले एक स्त्री जंगल में मिट्टी खोदते समय गलती से किसी शावक को मार बैठी। इस अनजाने पाप के कारण उसके बच्चों पर संकट आने लगा। व्यथित मां ने पूरे मन से माता अहोई की पूजा की, अपने अपराध का पश्चाताप किया… और माता ने उसकी संतान को संकट से मुक्त कर दिया। तभी से यह व्रत माताएं अपनी संतान की रक्षा और सुखमय जीवन के लिए रखने लगीं।
जब मां अहोई माता के सामने दीप जलाकर folded hands में आंखें बंद करती है… तो वो सिर्फ पूजा नहीं करती — वो अपने बच्चों के हर दुःख, हर बीमारी, हर संकट को खुद पर लेने की अदृश्य प्रतिज्ञा करती है।
बच्चों की एक मुस्कान के लिए मां दिनभर जल तक नहीं पीती… और जब रात में तारे निकलते हैं और मां जल ग्रहण करती है — तो उसके चेहरे पर जो संतोष और आशीर्वाद की चमक होती है… वही इस व्रत की असली शक्ति है।
अहोई व्रत… सिर्फ एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं — यह मां के निस्वार्थ प्रेम, उसके त्याग और अपनी संतान के लिए भगवान से लड़ी गई एक भावनात्मक लड़ाई का प्रतीक है।”
“जहां मां की सच्ची प्रार्थना होती है… वहां भगवान भी रुककर आशीर्वाद देते हैं।”



