असम

असम-नगालैंड सीमा पर उरियमघाट में उबाल: “हिमंत बिस्वा शर्मा का काम नहीं

अतुल बोरार का काम नहीं" के नारों से गूंजा इलाका, सीमांत नागरिकों की सुरक्षा मांग ने लिया उग्र रूप। 

 नेशनल प्रेस टाइम्स, ब्यूरो

असम : नगालैंड सीमा के गोलाघाट जिले के उरियमघाट क्षेत्र में मंगलवार को हजारों सीमावर्ती नागरिकों ने राज्य सरकार के खिलाफ आक्रोशपूर्ण प्रदर्शन किया। प्रदर्शनकारियों ने मुख्यमंत्री डॉ. हिमंत बिस्वा शर्मा और गोलाघाट जिले के मंत्री अतुल बोरा को विफल ठहराते हुए कहा कि वे वर्षों से सीमा क्षेत्र में नागा अतिक्रमण और असुरक्षा की घटनाओं पर कोई ठोस कदम नहीं उठा सके। पूरा इलाका “हिमंत बिस्वा शर्मा का काम नहीं, अतुल बोरा का काम नहीं” जैसे नारों से गूंज उठा। महिलाओं, युवाओं और बुजुर्गों सहित हजारों नागरिकों ने इस विशाल ‘जन हुंकार’ कार्यक्रम में भाग लेकर अपनी नाराजगी और भय दोनों को खुलकर सामने रखा। प्रदर्शनकारियों ने आरोप लगाया कि नगालैंड की ओर से लगातार अतिक्रमण, हिंसात्मक झड़पें और जमीन हड़पने की कोशिशें जारी हैं। ग्रामीणों का कहना है कि इन घटनाओं से उनके जीवन और खेती-बाड़ी दोनों पर गहरा प्रभाव पड़ा है। कई बार उन्होंने जिलाप्रशासन, पुलिस और सरकार से सहायता की अपील की, लेकिन समस्या जस की तस बनी रही। स्थानीय लोगों के अनुसार, सीमा क्षेत्र में बच्चों तक को भय में जीना पड़ रहा है। रात में ग्रामीणों का पहरा देना अब सामान्य बात बन गई है। “हम अपने ही राज्य में सुरक्षित नहीं हैं, यह कैसी सरकार है?”—एक वृद्ध नागरिक ने रोते हुए कहा। इस आंदोलन की सबसे बड़ी विशेषता रही कि इसमें स्थानीय महिलाओं ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। उन्होंने हाथों में बैनर लिए शासन के प्रति गहरी नाराजगी जताई। एक महिला ने कहा, “हर चुनाव में नेता वादे करते हैं, लेकिन जब सीमा पर गोली चलती है तब कोई देखने नहीं आता।” महिलाओं ने इसे अपने बच्चों के जीवन-मरण से जुड़ा प्रश्न बताया और कहा कि अगर सरकार अब भी नहीं जागी, तो वे गुवाहाटी जाकर धरने पर बैठेंगी। इस विरोध कार्यक्रम में ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन (AASU), ऑल असम ट्राइबल यूथ फ्रंट, सीमांत महिला समिति, किसान परिषद सहित कई स्थानीय संगठनों ने भाग लिया। सभा में सर्वसम्मति से निर्णय लिया गया कि जब तक सीमा विवाद और अतिक्रमण के मुद्दे का स्थायी समाधान नहीं होता, तब तक आंदोलन जारी रहेगा। संगठनों ने चेतावनी दी कि आने वाले दिनों में यह विरोध राज्यव्यापी रूप ले सकता है।सभा में वक्ताओं ने मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा शर्मा की सरकार पर सीधे निशाना साधते हुए कहा कि सरकार केवल घोषणाएँ कर रही है, ज़मीन पर कुछ नहीं हो रहा। उन्होंने गोलाघाट के मंत्री अतुल बोरा पर भी जनता से दूरी और संवेदनहीनता का आरोप लगाया। एक ग्रामीण नेता ने कहा, “हम वर्षों से सरकार से गुहार लगा रहे हैं—सुरक्षा दो, सम्मान दो—लेकिन अब धैर्य की सीमा खत्म हो चुकी है।” यहां पर पांच मुख्य मांगें रखी गई – 1.सीमा पर स्थायी फौजी चौकियां स्थापित की जाएं।

2. प्रभावित परिवारों को तत्काल मुआवजा और पुनर्वास सहायता दी जाए।

3. असम-नगालैंड सीमा विवाद के स्थायी समाधान के लिए केंद्र और राज्य की संयुक्त समिति बनाई जाए।

4. सभी सीमावर्ती गांवों में सड़क, स्कूल और स्वास्थ्य केंद्र की पुनर्बहाली हो।

5. भविष्य में नागा अतिक्रमण रोकने के लिए कठोर कानूनी ढांचा तैयार किया जाए।

प्रदर्शन के बाद उरियमघाट क्षेत्र में प्रशासन ने अतिरिक्त पुलिस बल तैनात किया है और हालात पर नजर रखी जा रही है। हालांकि ग्रामीणों ने इसे अस्थायी उपाय बताते हुए कहा कि स्थायी सुरक्षा व्यवस्था ही उनका समाधान है। क्षेत्र में माहौल तनावपूर्ण लेकिन संतुलित बताया जा रहा है। स्थानीय संगठनों ने अगले सप्ताह गुवाहाटी में एक विशाल “जन-जागरण रैली” के आयोजन की घोषणा भी की है, जिसमें सीमांत क्षेत्रों के हजारों लोग जुटेंगे। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह विरोध अब राज्य राजनीति के लिए गंभीर चेतावनी बन गया है। सीमांत असुरक्षा का यह मुद्दा सरकार की छवि और विश्वसनीयता दोनों की परीक्षा ले सकता है। उरियमघाट के जन-आंदोलन ने यह स्पष्ट कर दिया है कि सीमांत नागरिक अब केवल वादों पर नहीं, बल्कि वास्तविक सुरक्षा और न्याय की मांग पर दृढ़ रहेंगे।

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