बागपत

बागपत को पुनः “व्याघ्रप्रस्थ” घोषित किए जाने की मांग तेज

ऐतिहासिक गौरव पुनर्जीवन की पहल

नेशनल प्रेस टाइम्स, ब्यूरो
बागपत। जनपद-बागपत को उसके प्राचीन नाम ‘व्याघ्रप्रस्थ’ के रूप में पुनः घोषित कराने की मांग एक बार फिर जोर पकड़ती दिखाई दे रही है। जिले के प्रबुद्ध नागरिकों, इतिहासकारों और सामाजिक संगठनों द्वारा एक विस्तृत पत्र संबंधित अधिकारियों को भेजा गया है, जिसमें बागपत के गौरवशाली इतिहास, सांस्कृतिक विरासत और महाभारतकालीन पहचान को पुनः जीवित करने की अपील की गई है।
व्याघ्रप्रस्थ—जब बागपत को शेरों की भूमि कहा जाता था
जानकारी के अनुसार मुगलकाल से काफी पहले बागपत का नाम व्याघ्रप्रस्थ था। महर्षि वाल्मीकि द्वारा अपने अन्य आश्रमों की भांति इस भूमि पर आश्रम स्थापित किया गया, क्योंकि यह क्षेत्र शेरों की भूमि माना जाता था। मान्यता है कि महर्षि ने यहीं पर श्री लव-कुश को शेरों से भिड़ाकर अजेय योद्धा बनाया था।
इतिहासकारों का मत है कि महाभारत के समय श्रीकृष्ण ने कौरवों से जिन पाँच गांवों की मांग की थी, उनमें व्याघ्रप्रस्थ भी शामिल था। वाकपटुता के लिए पूरे अखण्ड भारत में प्रसिद्ध यह क्षेत्र वाक्यप्रस्थ के नाम से भी जाना जाता था।
जनप्रतिनिधियों को भेजा गया भावनात्मक पत्र
भेजे गए पत्र में इस ऐतिहासिक गौरव को वर्तमान पहचान से जोड़ने की मांग की गई है। पत्र में महाभारत का वह प्रसंग भी उल्लेखित है, जिसमें अर्जुन ने विराट नगर की गौएँ अकेले ही कौरवों से छुड़ाई थीं। इसी संदर्भ में पत्र में कहा गया है कि आज बागपत के खोए हुए गौरव—“गौएँ”—को छद्म राजनीति ने अपहृत कर लिया है और अब समय आ गया है कि जनप्रतिनिधि इन्हें वापस लाएं।
पत्र में स्पष्ट लिखा है कि—
“जनपद-बागपत को अविलंब व्याघ्रप्रस्थ घोषित कराया जाए। नजरअंदाज हुई गौरवगाथाओं को अस्तित्व में लाया जाए। ऐतिहासिक स्थलों को आकर्षक पर्यटन स्थलों के रूप में विकसित किया जाए।”
स्वामी दयानन्द और नेताजी सुभाषचंद्र बोस के विचारों का उल्लेख
पत्र में आर्य समाज के संस्थापक स्वामी दयानन्द सरस्वती के उस प्रसिद्ध कथन का उल्लेख किया गया है—
“भारत, भारतीयों के लिए है, विदेशियों के लिए नहीं।”
इसी क्रम में यह संदेश भी जोड़ा गया है कि भारत किसी भी प्रकार के उन्माद, अलगाववाद और छद्म सियासत का केंद्र नहीं होना चाहिए।
नेताजी सुभाषचंद्र बोस के नारे—“तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा”—का संदर्भ देते हुए कहा गया है कि इसी भाव से बागपत को पुनः व्याघ्रप्रस्थ बनाने का संकल्प जागरूक जनों में प्रबल हो रहा है।
“व्याघ्रप्रस्थ आपके योगदान को वरदान बनाएगा…”
पत्र में संबोधित जनप्रतिनिधि को यह संदेश दिया गया है कि यदि वे इस दिशा में कदम उठाएँ, तो व्याघ्रप्रस्थ जिला उनके योगदान को ऐतिहासिक वरदान के रूप में याद रखेगा।
साथ ही यह भी कहा गया है कि—
“व्याघ्रप्रस्थ लोगों का मुद्दतों से सोया अरमान जगाएगा, आपके लक्ष्य को परवान चढ़ाएगा।”
2047 के भारत-निर्माण में योगदान का विश्वास
पत्र में यह पूर्ण विश्वास व्यक्त किया गया है कि यदि जनपद को उसके मूल नाम और पहचान से जोड़ा गया, तो बागपत मिशन 2047 के अंतर्गत एक आदर्श और अनुकरणीय जिला बन सकता है।
जिले की सांस्कृतिक धरोहर, प्राचीन पुरास्थल और ऐतिहासिक महत्व नए विकास के आयाम जोड़ेंगे।
जल्द हो सकता है आंदोलन तेज
सूत्रों के अनुसार स्थानीय इतिहासकार, शिक्षक, सामाजिक कार्यकर्ता और युवा समूह इस मांग पर जल्द ही एक संयुक्त मंच तैयार कर सकते हैं। व्याघ्रप्रस्थ नामकरण को लेकर जनचर्चा तेज है और लोग इसे सिर्फ नाम बदलने का विषय नहीं, बल्कि अतीत की पहचान और सांस्कृतिक अस्तित्व के पुनर्जीवन के रूप में देख रहे हैं। इस अवसर पर सुभाष चंद्र शर्मा, इकबाल सिंह(कवि), नरेंद्र जैन(ज्वेलर्स), तेजपाल मुखिया व संदीप तोमर आदि मौजूद रहे।
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