गोड्डा
शिक्षा के मंदिर में हाइड्रोसिल का आपरेशन, मरीज की मौत

नेशनल प्रेस टाइम्स, ब्यूरो
बसंतराय। बसंतराय थाना क्षेत्र के महेशपुर से इस वक्त की बड़ी खबर सामने आ रही है, जहां शिक्षा के मंदिर को कथित रूप से ऑपरेशन थिएटर बना दिया गया। प्लस टू उच्च विद्यालय के एक क्लासरूम में हाइड्रोसिल का ऑपरेशन किए जाने का मामला है और इसी कथित लापरवाही के बीच गोराडीह, भागलपुर निवासी बुद्धन मंडल की मौत के बाद पूरे इलाके में आक्रोश फैल गया है। जिला प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं।
महेशपुर स्थित प्लस टू उच्च विद्यालय… एक ऐसा स्थान जहां बच्चों को उच्च शिक्षा मिलनी चाहिए, जहां क्लासरूम में शिक्षक और छात्र ज्ञान की बातें करें, जहां भविष्य तैयार हो… लेकिन आज उसी विद्यालय के एक कमरे में ऑपरेशन थिएटर बना दिया गया। जी हां, सरकारी अस्पताल में मिलने वाली सेवा अब स्कूल के कमरे में दी जा रही थी। बताया जा रहा है कि कुछ डॉक्टरों द्वारा साल में केवल दो दिन हाइड्रोसिल का ऑपरेशन किया जाता था, और इसके लिए स्कूल के क्लासरूम का इस्तेमाल किया जाता था।
जरा सोचिए… जिस कमरे में ब्लैकबोर्ड होना चाहिए, वहां ऑपरेशन टेबल रखी गई। जहां बच्चों की किताबें होनी चाहिए, वहां सर्जिकल उपकरण रखे गए। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या वहां बुनियादी सुविधाएं थीं? क्या वहां ऑक्सीजन सिलेंडर था? क्या वहां इमरजेंसी की स्थिति से निपटने के लिए मॉनिटरिंग मशीनें थीं? क्या वहां साफ-सफाई और संक्रमण से बचाव के मानक पूरे किए गए थे? मृतक के परिजनों के अनुसार अनुसार, वहां न तो कोई आधुनिक सुविधा थी और न ही स्वच्छता का ध्यान रखा गया था। हालात इतने खराब थे कि लोग उसे जानवरों के तबेले से भी बदतर बता रहे हैं।
यहां सवाल सीधे तौर पर स्वास्थ्य विभाग पर उठता है। क्या इस ऑपरेशन कैंप की जानकारी सिविल सर्जन को थी? अगर जानकारी थी, तो अनुमति किस आधार पर दी गई? और अगर जानकारी नहीं थी, तो फिर बिना सूचना के इतने बड़े स्तर पर ऑपरेशन कैसे हो रहे थे? क्या यह सब बिना किसी कागजी प्रक्रिया के चल रहा था? क्या यह पूरा खेल किसी मिलीभगत का नतीजा था? मामला तब और दर्दनाक हो गया जब गोराडीह, भागलपुर, बिहार के निवासी बुद्धन मंडल की ऑपरेशन के बाद मौत हो गई। एक परिवार का सहारा छिन गया। घर में मातम पसरा है। परिजन रो-रोकर सवाल पूछ रहे हैं — अगर सही अस्पताल में इलाज होता, अगर पूरी सुविधा होती, अगर लापरवाही नहीं होती… तो क्या आज बुद्धन मंडल जिंदा होते? परिवार वालों का आरोप है कि ऑपरेशन के दौरान और बाद में कोई समुचित देखभाल नहीं की गई। जब हालत बिगड़ी तो उन्हें समय पर उचित चिकित्सा सुविधा नहीं मिली। आखिर क्यों? क्या इसलिए कि यह कोई अधिकृत अस्पताल नहीं था? क्या इसलिए कि वहां संसाधनों की कमी थी? या इसलिए कि यह सब नियमों को ताक पर रखकर किया जा रहा था? गांव में आक्रोश है। लोग पूछ रहे हैं — शिक्षा मंदिर को ऑपरेशन थिएटर किसने बनाया? किसके आदेश पर? क्या स्कूल प्रबंधन को इसकी जानकारी थी? क्या शिक्षा विभाग को सूचना दी गई थी? क्या जिला प्रशासन को इसकी भनक थी? हम जिला प्रशासन से सीधे सवाल करते हैं —
क्या स्कूल परिसर में सर्जरी की अनुमति दी गई थी? क्या इस ऑपरेशन के लिए कोई लिखित आदेश था? क्या ऑपरेशन करने वाले डॉक्टर विधिवत पंजीकृत और अधिकृत थे?
क्या वहां मेडिकल प्रोटोकॉल का पालन किया गया?
और सबसे महत्वपूर्ण — बुद्धन मंडल की मौत के लिए जिम्मेदार कौन है? यह मामला सिर्फ एक व्यक्ति की मौत का नहीं है। यह मामला उस व्यवस्था का है जिसमें गरीबों को सस्ती या मुफ्त सेवा के नाम पर जोखिम में डाल दिया जाता है। अगर किसी को स्वास्थ्य सेवा देनी है, तो क्या वह मानकों के अनुरूप नहीं होनी चाहिए? क्या गरीब की जान की कीमत कम होती है? आज जरूरत है निष्पक्ष और उच्चस्तरीय जांच की। पोस्टमार्टम रिपोर्ट सार्वजनिक हो। मेडिकल टीम की भूमिका की जांच हो। जिन अधिकारियों ने लापरवाही की, उन पर कड़ी कार्रवाई हो। अगर कोई दोषी पाया जाए, तो उसका लाइसेंस रद्द किया जाए और कानूनी कार्रवाई की जाए। मृतक के परिवार को उचित मुआवजा दिया जाए। साथ ही, यह सुनिश्चित किया जाए कि भविष्य में किसी भी स्कूल, पंचायत भवन या गैर-स्वीकृत स्थान पर बिना मानक व्यवस्था के कोई ऑपरेशन न हो। स्वास्थ्य शिविर अगर लगाना है, तो पूरी तैयारी और सुरक्षा के साथ लगे। प्रशासन की जिम्मेदारी है कि वह जनता के भरोसे को टूटने न दे। महेशपुर की यह घटना चेतावनी है। अगर आज सवाल नहीं पूछे गए, अगर आज जवाब नहीं मांगा गया, तो कल फिर किसी और घर का चिराग बुझ सकता है।
इस संबंध में गोड्डा सिविल सर्जन से टेलीफोन पर बात किया तो सिविल सर्जन ने बताया कि मुझे कोई जानकारी नहीं है। जांच कर कार्रवाई करता हूं।



