ललितपुर
जयंती विशेष आचार्य विनोबा भावे
जब तक जमीन की समस्या रहेगी तब तक संत विनोबा प्रासंगिक रहेंगे : प्रो. भगवत नारायण शर्मा

नेशनल प्रेस टाइम्स, ब्यूरो
ललितपुर। आचार्य विनोबा भावेजी की जयंती पर आयोजित एक परिचर्चा को संबोधित करते हुए नेहरू महाविद्यालय के सेवानिवृत्त प्राचार्य प्रो. भगवत नारायण शर्मा ने कहा कि शंकराचार्य की तरह ज्ञानी और बुद्ध की करुणा के समन्वय संत विनोबा स्वतंत्र भारत में तेरह वर्षो तक पैदल घूमे। पृथ्वी के घेरे से भी अधिक अर्थात 36 हजार 500 मील के लगभग उन्होंने पदयात्रा करके 44 लाख एकड़ जमीन दान में प्राप्त करके भूमिहीनों में बांट दी। विनोबाजी अक्सर कहते थे मां कभी सम्पन्न और निर्धन बेटे में भेद नहीं करती। मैं भी धरती मां का छटवां निर्धन बेटा हूं। आपकी भूमि के मात्र छटवें हिस्से का याची हूं। जब कोई विनोबाजी से यह सवाल करता कि क्या जमीन की समस्या हल हो गई? तो उनका सीधा, सच्चा सरल उत्तर होता कि आग का काम सिर्फ जलना है। आग इस बात की चिंता नहीं करती कि उस पर हम चाय बना रहे हैं या चावल। विनोबाजी की धधकाई गई आग के प्रकाश में जनता ने भली -भांति जान लिया कि दुराग्रही दुर्योधन, आज के युग में भी सुई की नोंक के भर जमीन अपने विपन्न पड़ौसियों को नहीं देना चाहते। परंतु संत विनोबा ने कहा कि हवा, आग और पानी की तरह जमीन भी सबकी है। मानव देह हमें दूसरों को दु:ख देने के लिए नहीं वल्कि डबडबाई हुई आँखे के एक-एक आँसू पोंछने के लिए मिली है। संत वर्णी जी ललितपुर में चातुर्मास कर रहे थे तब सागर की ओर से पैदल चलते हुए उसी समय विनोबाजी भी ललितपुर आये, तो वर्णी जी क्षेत्रपालजी मंदिर से सासंघ, उनसे मिलने जी.आई.सी.के प्रांगढ़ में आयोजित सभा में स्वयं पहुंच गए। जबकि विनोबाजी उनसे क्षेत्रपालजी में मिलने के लिए स्वयं जाने को तैयार थे। देश के दोनों महान संत जब एक दूसरे से मंच पर मिले तो, प्रत्यक्षदर्शियों की आंखों में प्रेमाश्रु छलछला उठे। वर्णीजी ने संबोधित करते हुए कहा कि नाचीज जमीन के छटवें टुकड़े के लिए एक महान ज्ञानी-ध्यानी संत को तेलंगाना से चलकर ललितपुर आना पड़ा। अपने अंतिम पडाव देहली जाने के लिए। यह सत्य, प्रेम और अपरिग्रह का दुर्लभ सुअवसर है। ह्रदय खोलकर भूदान करने का पुण्योत्सव है। भौतिक सम्पत्ति चलायमान क्षणों की प्रतीक है। बुन्देली लोकगीतों में स्पष्ट कहा गया है कि जोवनजोर- लुम, जर-जितनी जा माया है-दिन दस की, जिन बाँधों गठरिया अपजश की। परन्तु सत्य अहिंसा जैसे चिरंतन मूल्यों का विनियोग व्यक्ति और समाज को मानवोचित आकार प्रदान करता है। आजकल बेरोजगारी, मंहगाई और दहेज जैसीं कुरीतियों की मार झेल रहे छोटे किसान अपनी जमीन को कौंडिय़ों के दाम पर गैर खेतिहरों को बेचने पर मजबूर हो रहे हैं। काश! विनोबाजी का ग्रामदान का सपना साकार होता तो ऐसी त्रासद स्थिति न झेलना पड़ती। उनके द्वारा उदघोषित नारे जय जगत के साथ, समता और सत्य अहिंसा के पुजारी विनोबा जी सदैव अमर रहेंगे।