उत्तरकाशी

बौद्ध नववर्ष पर भोटिया जनजाति में लोसर मेला मानने की अनूठी परंपरा

नेशनल प्रेस टाइम्स, ब्यूरो

उत्तरकाशी : चांँद नव वर्ष से शुरु होने वाले नववर्ष के उल्लास व उत्साह में सीमांत क्षेत्र के बौद्ध धर्मावलम्बि लोसर मेले का आयोजन महाशिवरात्रि के एक दिन पश्चात करते है ।
यू तो भारत वर्ष में अनेक पर्व-त्योहार मनाए जाते हैं । भाषा, बोली और प्रांतों के अनुसार लोग इन्हें अपने अनूठे अंदाज में समारोहपूर्ण आयोजन करते हैं। वहीं उत्तराखंड के सीमांत जनपद उत्तरकाशी के डुडा तहसील में स्थित वीरपुर में बगोरीगाँव के लोग भी शीतकाल के उत्तरार्ध में लोसर मेले का आयोजन बड़े हर्षोल्लास से करते हैं । लोसर मेला बौद्ध धर्मावलंबियों में नववर्ष का प्रतीक पर्व है। शीत ऋतु समाप्ति पर बसंत ऋतु सरसों के पीले फूलों के संग दस्तक देती है। प्रकृति नाना प्रकार के फूलों से सजकर आनंदित होती है । नव पल्लव उत्सव के रूप में लोसर मेला मनाया जाता है । बौद्ध धर्मावलंबियों में लोसर मानने की प्राचीनकाल से परंपरा रही है । भारत के सीमांत क्षेत्रो के अलावा तिब्बत ,चीन में भी चाद्र नव वर्ष मानने की बात पढने व सुनने में आती है । इस मेले का ठीक सा इतिहास किसी को भी नहीं पता, लेकिन इस के नाम से ही आनंद-उल्लास का वातावरण छा जाता है। हफ्ते भर चलने वाले इस आयोजन में स्थानीय लोग दैनिक कार्य को छोड़कर एक-दूसरे को बधाइयां व शुभकामनाएं देते नजर आते हैं । इसकी सबसे प्रमुख विशेषता यह है कि प्रकृति संसाधनो के साथ मनाया जाता है । प्रथम दिवस की रात्रि को मशालों के साथ दीपावली पर्व मनाया जाता है। लोग जंगलों से चीड़ के तेल वाली लकड़ी (स्थानीय भाषा में ‘दलि’) से मशालें बनाते हैं । ढोल की थाप पर नाचते-गाते हुये । गांव के सभी लोग गाँव के अंतिम छोर पर इकट्ठा एकत्रित होते हैं । वहां मशालों से विशाल अग्नि प्रज्वलित होती है । इसकी परिक्रमा कर लोग नाचते-गाते हुये घर लौटते हैं । साथ में पत्थरों के छोटे-छोटे टुकड़ों तिरिगता मिरिगमी कहते हुए बंधु-बांधवों को उपहार मे देते हैं। घर- घर शुभता के प्रतीक के रूप बाटे जाते है । अगली सुबह छोटे बच्चे,नये वस्त्रों में सुसज्जित होकर हाथों में हरियाली लेकर घरों में राम रामजी कहते हुये हरियाली बांटते हुये , शुभकामनाएं देते है । हरियाली जो कि शुभता व मंगल का प्रतीक हैं । घरों में विविध प्रकार के व्यंजन बनाये जाते है और अतिथियों, बहिन , बेटीयों को परोसे जाते हैं । मातापिता के घरों पर विशेष तौर पर विवाहित बेटीयों / ध्याणीयों को आमंत्रित करने की परंपरा है । यथा सार्मथ उपहार ,वस्त्र , धन देने की परंपरा है । कुछ घरों पर रंगबिरंगे बौद्ध मंत्रो से लिखित झंडे लगाने का भी प्रचलन है ,मान्यता हैं मत्रों से अनिष्ट समाप्त होता है । पहले की अपेक्षा अब कुछ घरों में झडे लगे दिखते है । अतिंम दिवस आटे की होली के साथ , अगले वर्ष पुन:लोसर की प्रतीक्षा मेला बिराम लेता है ।

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