गाजियाबाद

डासना जेल में कैद हुनर को मिला सम्मान

जिला जज ने खरीदी राधा-कृष्ण की पेंटिंग

नेशनल प्रेस टाइम्स, ब्यूरो।
लोनी गाजियाबाद : जिला न्यायालय परिसर में लगाए गए डासना जेल के स्टॉल पर कैदियों की कला और हुनर ने सभी का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया। इस दौरान जिला जज विनोद सिंह रावत ने कैदी गिप्पी ढाका द्वारा बनाई गई राधा-कृष्ण की एक सुंदर पेंटिंग खरीदकर कलाकार का उत्साह बढ़ाया।
 कैदी गिप्पी ढाका की कूची का कमाल 
स्टॉल पर कई हस्तनिर्मित उत्पाद प्रदर्शित किए गए थे, लेकिन राधा-कृष्ण की एक आकर्षक पेंटिंग ने विशेष रूप से सबका मन मोह लिया। यह पेंटिंग डासना जेल में बंद कैदी गिप्पी ढाका ने बनाई थी। जैसे ही जिला जज विनोद सिंह रावत, जज संजय वीर सिंह और समिति प्रभारी जज नीरज गौतम स्टॉल पर पहुंचे, उनकी नजर इस कलाकृति पर ठहर गई।
पेंटिंग में राधा-कृष्ण के प्रेम और भावनात्मक जुड़ाव को बेहद खूबसूरती से दर्शाया गया था। जिसने भी इसे देखा, कलाकार की प्रतिभा की सराहना किए बिना नहीं रह सका।
 जिला जज ने बढ़ाया  हौसला
पेंटिंग से प्रभावित होकर जिला जज ने इसे खरीदने की इच्छा जताई। इसके बाद जेल प्रशासन ने यह पेंटिंग उन्हें सौंप दी। हालांकि इसकी कीमत को लेकर आधिकारिक जानकारी साझा नहीं की गई है।
डिप्टी जेलर डॉ. ब्रजेश पांडेय ने बताया कि कैदियों की बनाई अन्य पेंटिंग्स और उत्पादों को भी न्याय विभाग के अधिकारियों ने खूब सराहा।
 लकड़ी के राम मंदिर और न्याय की प्रतीक कलाकृतियां बनीं आकर्षण
स्टॉल पर लकड़ी से बना राम मंदिर का मॉडल भी लोगों के आकर्षण का केंद्र रहा। मंदिर की बारीक नक्काशी ने दर्शकों को खूब प्रभावित किया। इसके अलावा कृष्ण झूला, अदालत में इस्तेमाल होने वाला ‘ऑर्डर-ऑर्डर’ का लकड़ी का हथौड़ा, न्याय की तराजू आदि कलात्मक वस्तुएं भी यहां प्रदर्शित की गईं।
इन सभी कलाकृतियों ने यह साबित किया कि जेल की चारदीवारी के भीतर भी रचनात्मकता और प्रतिभा जीवित है।
 जेल में मिल रही हुनर की ट्रेनिंग
डासना जेल में बंदियों को विभिन्न प्रकार के हुनर सिखाए जा रहे हैं। यहां जूते, पेंटिंग, होम डेकोर आइटम, मूर्तियां, गमले, घड़े और दीये आदि तैयार किए जाते हैं। ये सभी उत्पाद “मेड इन जेल” टैग के साथ बेचे जाते हैं।
फॉर्मल और कैजुअल जूते लगभग 300 रुपये में उपलब्ध हैं, जबकि पेंटिंग्स की कीमत करीब 6000 रुपये तक होती है। कैदियों को सिलाई सहित अन्य व्यावसायिक प्रशिक्षण भी दिया जाता है, ताकि वे रिहाई के बाद आत्मनिर्भर बन सकें।
डासना जेल की यह पहल न केवल बंदियों को आत्मनिर्भर बना रही है, बल्कि समाज को यह संदेश भी दे रही है कि सही मार्गदर्शन और अवसर मिलने पर प्रतिभा कहीं भी पनप सकती है।
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