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कुरुक्षेत्र: राहुल को प्रतिरोध का नारा बनाएगा विपक्ष का चेहरा

2029 में पीएम मोदी और नेता विपक्ष का सीधा मुकाबला

नई दिल्ली :  लोकसभा चुनाव में अभी तीन साल का वक्त है लेकिन राजनीति जिस दिशा में चल पड़ी है, उससे साफ जाहिर है कि न सिर्फ 2029 में होने वाले लोकसभा चुनाव बल्कि अब 2029 तक जितने भी चुनाव होंगे सब में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और नेता विपक्ष राहुल गांधी के बीच ही सीधा मुकाबला होगा। अगर सब कुछ ठीक रहा तो इस बार लोकसभा चुनावों में कांग्रेस राहुल गांधी को अपने नेता और भावी प्रधानमंत्री का उम्मीदवार घोषित करके चुनाव लड़ेगी और इससे सहमति असहमति सहयोगी दलों पर छोड़ देगी। उधर स्वाभाविक रूप से एनडीए और भाजपा का चेहरा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ही रहेंगे।
युवाओं और छात्रों से सीधे संवाद की पहल का मकसद क्या?
इसका संकेत खुद राहुल गांधी ने विपक्षी इंडिया गठबंधन की बैठक में दिए गए अपने भाषण में दिया। उन्होने कहा कि अब देश में चुनावों की परंपरागत राजनीति से आगे प्रतिरोध की राजनीति का युग आ गया है। प्रतिरोध की राजनीति से राहुल गांधी का सीधा मतलब है कि मोदी सरकार को संसद के साथ-साथ विपक्ष अब सड़क पर भी घेरेगा। राहुल ने कहा कि सभी संस्थाएं सरकार के कब्जे में हैं और चुनावों का कोई मतलब नहीं रह गया है। इसलिए कांग्रेस को प्रतिरोध की राजनीति के अपने पुराने दौर में लौटना होगा। राहुल ने सिर्फ एलान ही नहीं किया बल्कि उन्होंने प्रतिरोध की राजनीति की शुरूआत करते हुए सबसे पहले युवाओं और छात्रों से सीधे संवाद करने के कार्यक्रम की घोषणा कर दी है।इसकी शुरूआत वह कोटा, इलाहाबाद, पटना और दिल्ली में छात्र युवा सम्मेलन से कर रहे हैं।
क्या नरेंद्र मोदी के मुकाबले राहुल गांधी को आगे करने में कोई गुरेज नहीं?
भाजपा और एनडीए तो 2014 से ही चाहे लोकसभा हो या विधानसभा का चुनाव नरेंद्र मोदी को आगे करके उनके नाम पर ही हर चुनाव लड़ रहा है। सत्ता पक्ष के लिए नरेंद्र मोदी का नेतृत्व और नाम चुनावों में जीत का सबसे बड़ा मंत्र है जबकि इसके विपरीत कांग्रेस मोदी के मुकाबले अपने किसी भी नेता को आगे करके चुनाव लड़ने की हिम्मत नही जुटा पा रही थी। इसी तरह 2024 के लोकसभा चुनावों में विपक्षी इंडिया गठबंधन भी मोदी के मुकाबले बिना कोई चेहरा आगे लाए ही मैदान में उतरा था। लेकिन अब कांग्रेस जिस राह पर चल पड़ी है, उससे यह साफ है कि अब उसे नरेंद्र मोदी के मुकाबले राहुल गांधी को आगे करने में कोई गुरेज नहीं है। अब राहुल गांधी खुद आगे बढ़कर सरकार के खिलाफ होने वाली लड़ाई की कमान संसद के साथ सड़क पर भी संभालने के लिए तैयार हैं।
भाजपा ने क्यों नहीं गिना नेहरू के 1946 से लेकर 1952 तक का कार्यकाल?
हाल ही में भारतीय जनता पार्टी और सत्तारूढ़ एनडीए गठबंधन ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार के बारह साल पूरे होने का जश्न मनाया। इस जश्न के दौरान न सिर्फ मोदी सरकार के 12 साल के कार्यकाल की उपलब्धियों का जोर-शोर से प्रचार प्रसार किया गया बल्कि यह भी बताया गया आम चुनावों से निर्वाचित प्रधानमंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी ने प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू को भी पीछे छोड़ दिया है। इसे साबित करने के लिए नेहरू के 1946 से लेकर 1952 तक के कार्यकाल को इस आधार पर छोड़ दिया गया कि यह समय देश के पहले आम चुनावों से पहले का था। इसलिए 1952 के आम चुनावों के बाद से नेहरू के कार्यकाल की तुलना मोदी के 2014 से अब तक के कार्यकाल से की गई और बताया गया कि निर्वाचित प्रधानमंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी सबसे लंबे समय तक इस पद पर रहने वाले देश के पहले प्रधानमंत्री बन गए।
क्या आगे भी सारे चुनाव मोदी के चेहरे पर लड़ेगा एनडीए?
हालांकि नेहरू पहले 1946 में अंतरिम सरकार के प्रधानमंत्री मनोनीत हुए। इसके बाद जब देश 15 अगस्त 1947 को देश आजाद हुआ तो संविधान सभा निर्वाचित हुई और नेहरू फिर प्रधानमंत्री बने और 26 जनवरी 1950 को संविधान लागू होने के बाद भी संविधान सभा भंग नहीं हुई बल्कि संसद के रूप में 1952 में चुनावों के बाद नई सरकार के गठन होने तक बनी रही। इसलिए नेहरू के इस कार्यकाल को अनिर्वाचित नहीं कहा जा सकता है। लेकिन सत्ता पक्ष की यह कवायद 2029 के लोकसभा और उससे पहले होने वाले चुनावों के लिए फिर नरेंद्र मोदी के चेहरे को ज्यादा चमकदार और कामयाब बनाकर जनता के बीच पेश करने के लिए की जा रही है। यानी यह तय है कि आगे भी सारे चुनाव एनडीए मोदी के चेहरे और नाम के सहारे ही लड़ेगा।
क्या अब कोई भी क्षत्रप कांग्रेस को उलाहना नहीं देगा?
उधर विपक्षी खेमे की तस्वीर अब खासी बदल गई है। हाल ही में हुए पांच विधानसभा चुनावों में प.बंगाल में ममता बनर्जी और तमिलनाडु में एमके स्टालिन के किले ढह गए और इसके पहले बिहार में तेजस्वी यादव, दिल्ली में अरविंद केजरीवाल और महाराष्ट्र में शरद पवार और उद्धव ठाकरे भाजपा के हाथों हार चुके हैं। कांग्रेस भी 2024 के बाद हरियाणा, महाराष्ट्र और असम में भाजपा से हारी है लेकिन केरल में उसकी जीत और तमिलनाडु में डीएमके को छोड़कर टीवीके सरकार में शामिल होने से पार्टी को फिर आक्सीजन मिल गई है। इसलिए अब मामला कांग्रेस और क्षत्रपों के बीच बराबरी का हो गया है और अब कोई भी क्षत्रप कांग्रेस को यह उलाहना नहीं दे सकता कि भाजपा का मुकाबला क्षेत्रीय दल ही सफलता पूर्वक कर पाते हैं।
2029 के लोकसभा चुनावों से पहले राज्यों के सियासी समीकरण कैसे?
क्षत्रपों में अब झारखंड में हेमंत सोरेन अकेले ऐसे नेता हैं जो दो बार लगातार भाजपा को चुनावी मात दे चुके हैं और कांग्रेस के साथ उनका गठबंधन है जबकि 2014, 2017, 2019 और 2022 में लगातार भाजपा के हाथों चुनावी हार झेल चुके अखिलेश यादव ने 2024 में लोकसभा चुनावों में भाजपा को पटखनी देकर फिर से 2027 के विधानसभा चुनावों के लिए खम ठोंक रहे हैं। अब 2027 में उत्तर प्रदेश अकेला ऐसा राज्य है, जहां चुनाव में भाजपा का सपा से मुकाबला होगा और कांग्रेस उसकी सहयोगी पार्टी होगी। वहीं पंजाब में सत्तारूढ़ आम आदमी पार्टी के साथ कांग्रेस का सीधा मुकाबला होगा क्योंकि यहां भाजपा अभी अपनी जमीन बनाने की कोशिश कर रही है और अकाली दल के सामने अस्तित्व बचाने की चुनौती है। बाकी 2029 के लोकसभा चुनावों से पहले होने वाले सारे राज्यों उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश,गुजरात, कर्नाटक, राजस्थान, मध्य प्रदेश छत्तीसगढ़ में भाजपा और कांग्रेस के बीच मुख्य मुकाबला होगा। वहीं तेलंगाना में कांग्रेस बीआरएस और भाजपा के बीच त्रिकोणीय मुकाबला होगा। यहां भी कांग्रेस मुख्य किरदार होगी।
विदेश से जुड़े मुद्दों पर क्या है विपक्ष का रुख?
इसलिए अब ज्यादातर विधानसभा चुनावों में कांग्रेस के सामने कहीं अपनी सरकारें बचाकर दोबारा जीतने की और कहीं भाजपा को हराने की चुनौती है। उत्तर प्रदेश जहां कांग्रेस सपा की सहयोगी पार्टी होगी वहां भी कांग्रेस के प्रदर्शन पर भी बहुत कुछ नतीजे निर्भर करेंगे। यह बात कांग्रेस नेतृत्व समझ रहा है और इसीलिए अब बिना देर किए राहुल गांधी ने खुद को मैदान में उतार दिया है। चाहे महंगाई हो, बेरोजगारी हो, पर्चा लीक हो, सीबीएसई का गड़बड़झाला हो, भारत अमेरिका व्यापार समझौता हो, खाड़ी युद्ध में भारत की विदेश नीति हो और अमेरिकी हमले में तीन भारतीय नाविकों की मौत का मुद्दा हो हर मुद्दे पर राहुल गांधी सीधे प्रधानमंत्री मोदी को ही घेर रहे हैं। इस तरह उन्होंने एक तरह से मोदी के सामने खुद को सबसे बड़ी विपक्षी चुनौती के रूप में प्रस्तुत कर दिया है। सत्ता पक्ष इसे समझ चुका है इसलिए उसके भी हमले सबसे ज्यादा राहुल गांधी पर ही हो रहे हैं। इससे जाने अनजाने सत्ता पक्ष भी राहुल गांधी को ही मोदी के सामने विपक्ष का सबसे बड़ा चेहरा बना रहा है।
राहुल के प्रतिरोध के एजेंडे पर चर्चा क्यों?
अब सवाल है कि क्या क्षेत्रीय दल जो भले ही इन दिनों अस्त-व्यस्त हैं। कांग्रेस और राहुल गांधी का नेतृत्व स्वीकार करेंगे। कांग्रेस की रणनीति है कि उसे अपने संघर्ष के कार्यक्रम पर आगे बढ़ना है।राहुल गांधी ने लगभग उसी तरह पूरे विपक्ष और खुद कांग्रेस के सामने प्रतिरोध की राजनीति की चुनौती पेश कर दी है, जैसे कभी महात्मा गांधी ने आजादी के आंदोलन के दौरान उस कांग्रेस के सामने खड़ी की थी जो लंबे समय तक अंग्रेजों को सिर्फ ज्ञापन देने और उनसे चर्चा करने का क्लब भर थी।गांधी ने उसे सीधे अंग्रेज सरकार से सत्याग्रह के जरिए प्रतिरोध की राजनीति के अगुआ संगठन में बदल दिया था। राहुल गांधी कुछ उसी रास्ते पर हैं और अब उन्होंने प्रतिरोध का अपना एजेंडा तय कर लिया है और उस पर चल पड़े हैं।जिसे उनके साथ चलना हो चले वरना पीछे छूट जाए।अगर क्षेत्रीय दलों को अपनी जमीन बचानी होगी तो उन्हें भी प्रतिरोध की इस गांधीवादी राह पर राहुल के साथ चलना होगा।वरना प्रतिरोध की आंधी उनकी जमीन भी उनसे छीन लेगी।
क्या संगठन में कील कांटे दुरुस्त करने में जुटी भाजपा?
कांग्रेस की रणनीति है कि एक तरफ राहुल गांधी अपनी प्रतिरोधी की राजनीति को आगे बढ़ाएंगे तो दूसरी तरफ पार्टी संगठन में अपने कील कांटे दुरुस्त करते हुए आने वाले सभी चुनावों की तैयारी में जुटेगी।जिससे आने वाले चुनावों में ज्यादा से ज्यादा राज्यों में जीत दर्ज करके 2029 तक भाजपा के सामने खुद को एक विकल्प के रूप में पेश कर सके।

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