
पटना। बांकीपुर विधानसभा सीट पर हो रहे उपचुनाव में 44 उम्मीदवारों के लिए एनआर कटवाया गया था। इसमें से 39 उम्मीदवारों ने नामांकन पर्चा दाखिल किया। जांच प्रकिया के बाद चुनाव आयोग ने तेज प्रताप यादव की पार्टी की वीणा मानवी समेत 13 प्रत्याशियों का नामाकंन पत्र खारिज कर दिया। अब 26 प्रत्याशी बचे हैं। 16 जुलाई तक नाम वापस लेने का समय है। आइये जानते हैं कौन-कौन चुनावी मैदान में उतरे हैं?
बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव के लिए नामांकन पत्रों की जांच पूरी होने के बाद चुनावी तस्वीर काफी हद तक साफ हो गई है। जांच के बाद कुल 26 उम्मीदवार चुनाव मैदान में बने हुए हैं। अब सभी की नजर नाम वापसी की अंतिम तिथि पर टिकी है। राजनीतिक दलों के साथ-साथ निर्दलीय और छोटे दलों के प्रत्याशियों के बीच भी लगातार मंथन चल रहा है। माना जा रहा है कि अंतिम दिन कई उम्मीदवार अपना नाम वापस ले सकते हैं, जिससे मुकाबले की दिशा बदल सकती है।
लिस्ट में पहले नंबर पर पर केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान से चाचा पशुपति पारस की पार्टी राष्ट्रीय लोक जनशक्ति पार्टी के उम्मीदवार का नाम है। तनवीर आलम को पारस ने टिकट दिया। पूरे 26 उम्मीदवारों में तनवीर इकलौते मुसलमान प्रत्याशी हैं। प्रशासन ने पारस की पार्टी को राष्ट्रीय और राज्य राजनीतिक दलों की श्रेणी में रखा है। इस श्रेणी में भाजपा प्रत्याशी नीरज कुमार और राजद प्रत्याशी रेखा कुमारी का भी नाम है।
जनसुराज का नाम रजिस्ट्रीकृत राजनैतिक दलों की लिस्ट में शामिल
वहीं प्रशांत किशोर की पार्टी जनसुराज का नाम रजिस्ट्रकृत राजनैतिक दलों की लिस्ट में शामिल हैं। इस लिस्ट में समता पार्टी से अशोक कुमार, राष्ट्रीय जनसंभावना पार्टी से उपेंद्र सहनी, अखिल भारतीय जनसंघ से जितेंद्र दुबे, राइट टु रिकॉल पार्टी से निरंजन कुमार आचार्य, भारतीय आम आवाम से प्रदीप कुमार, प्राउटिस्ट ब्लॉक इंडिया से प्रेम शंकर प्रसाद, बिहार जस्टिस पार्टी से विनोद राय समेत अन्य कई नाम शामिल हैं। इसके अलावा नौ निर्दलीय उम्मीदवारों ने भी चुनावी ताल ठोक रखी है।
छोटे दलों और निर्दलीय उम्मीदवारों पर बड़े दलों की नजर
सबसे अधिक चर्चा मुख्य मुकाबले को लेकर है। फिलहाल भाजपा के नीरज कुमार, राजद की रेखा कुमारी, और जन सुराज समर्थित प्रशांत किशोर के इर्द-गिर्द चुनावी चर्चा केंद्रित है।
राजनीतिक पंडितों का कहना है कि नाम वापसी के दौरान कई छोटे दलों और निर्दलीय उम्मीदवारों पर बड़े दलों की नजर रहेगी। यदि इनमें से कुछ उम्मीदवार चुनाव से हटते हैं, तो इसका सीधा असर विभिन्न जातीय और स्थानीय वोटों के ध्रुवीकरण पर पड़ सकता है। खासकर मुस्लिम, सवर्ण और पिछड़े वर्ग के वोटों के समीकरण पर राजनीतिक दल लगातार नजर बनाए हुए हैं।



