अमरोहा
कंधों पर दादी और जुबां पर बोल बम
95 वर्षीय गोमुख देवी की अधूरी ख्वाहिश पूरी करने निकले पांच 'श्रवण कुमार'

नेशनल प्रेस टाइम्स,ब्यूरो
अमरोहा : 95 वर्षीय गोमुख देवी की हरिद्वार यात्रा की इच्छा उनके पांच पौत्रों ने पूरी की। रविंद्र अजय सोनू अनुराग और अमित ने अपनी असमर्थ दादी को श्रवण कुमार की तरह कंधों पर बैठाकर कांवड़ यात्रा कराने का संकल्प लिया। बम-बम भोले के जयकारे लगाते हुए वे 250 किलोमीटर की दूरी तय कर रहे हैं। पौत्रों के इस जज्बे को लोग सलाम कर रहे हैं।
अमरोहा। नाम गोमुख देवी, उम्र 95 साल। शरीर में लगभग 45 किलो वजन। आंखों की रोशनी धुंधली है और कानों से भी कम सुना जाता है। मगर, हरिद्वार की यात्रा करने की तमन्ना कभी पूरी नहीं हो सकी।
इस बीच उनकी इस तमन्ना को पूरा करने के लिए पांच पौत्रों ने बीड़ा उठाया। प्रण लिया कि दादी को हरिद्वार से कंधों पर बैठाकर लाएंगे और कांवड़ यात्रा में तीर्थ कराएंगे। सो, इस प्रण को पूरा करने के लिए पांचाें पौत्र श्रवण कुमार की तर्ज पर निकले और अब अपनी मंजिल की नजदीक पहुंच गए हैं।
हापुड़ जिले में पतित पावनी मां गंगा किनारे पर गढ़मुक्तेश्वर के गांव आलमनगर निवासी रविंद्र, अजय, सोनू, अनुराग और अमित पांचों तहेरे-चचेरे भाई हैं। इनके पिता भी पांच भाई हैं। इनके घर पर सबसे बुजुर्ग दादी हैं मगर, आज तक हरिद्वार नहीं जा पाई हैं।
इस बार उनकी भी सावन मास की कांवड़ यात्रा में शामिल होने की इच्छा हुई। यानी भगवान शिव का बुलाया आया। चलने में असमर्थ दादी को पांचों पौत्रों ने श्रवण कुमार की तरह कंधों पर बैठाकर कांवड़ यात्रा कराने की ठान ली। एक तरफ 45 किलाे गंगाजल है और दूसरी तरफ दादी को बैठा लिया और फिर बम-बम भोले करते हुए यात्रा शुरू कर दी। गांव से हरिद्वार की दूसरी 250 किमी है।
महाशिवरात्रि पर जलाभिषेक के साथ दादी को अमृत स्नान भी कराएंगे। रविवार की रात को यह लोग गजरौला में हाईवे पर शहबाजपुर डोर में पहुंचे। यहां पर रात्रि विश्राम के बाद आगे के लिए सोमवार को बढ़े। खास बात यह है कि पौत्रों के प्रण को देखकर लोग भी उनकी हिम्मत और जज्बे को सलाम कर रहे हैं और उनके फोटो-वीडियो भी इंटरनेट मीडिया पर प्रसारित कर रहे हैं।
गढ़मुक्तेश्वर में रूके थे श्रवण कुमार, उसी को प्रेरणा बनाकर पौत्रों ने लिया प्रण :
गजरौला : गढ़मुक्तेश्वर क्षेत्र के लठीरा में लगने वाले कार्तिक पूर्णिमा मेले को उत्तर भारत का ऐतिहासिक मेला भी कहा जाता है। बताते हैं कि राजा दशरथ के दौर में श्रवण कुमार जब अपने माता-पिता को तीर्थ कराने निकले थे तब वह यहां भी पहुंचे थे।
उस समय गंगा गढमुक्तेश्वर क्षेत्र स्थित प्राचीन गंगा मंदिर से सटकर बहा करती थीं। कार्तिक शुक्ल पक्ष में श्रवण कुमार के यहां ठहरने पर उस समय लोग उन्हें देखने पहुंचे थे और कार्तिक पूर्णिमा पर स्नान करके गए थे, तभी से यह रीत चली आना बताई जाती है। उसी से प्रण लेकर इन पांचों पौत्रों ने भी अपनी दादी को कांवड़ यात्रा कराई है।


