गोड्डा

महागामा का प्राचीन दुर्गा मंदिर, ऐतिहासिक धरोहर और परंपरा का गौरव

नेशनल प्रेस टाइम्स, ब्यूरो
 
महागामा। महागामा का प्राचीन दुर्गा मंदिर ऐतिहासिक धरोहर होने के साथ-साथ परंपरा का जीवंत प्रतीक भी है। इस मंदिर की स्थापना 600 ईस्वी के पूर्व मोल ब्रह्म राजा द्वारा की गई थी। जो इनकी कुलदेवी हैं। जो मोलब्रह्म वंशज के द्वारा मंदिर मैं पूजा पाठ की जाती है। इस मंदिर की भव्यता, स्थापत्य कला और धार्मिक महत्व आज भी क्षेत्र में इसे विशेष पहचान दिलाता है। मंदिर की दीवारों पर अंकित शिलालेख इसकी ऐतिहासिकता को प्रमाणित करते हैं। नवरात्र में यहां की पूजा का विशेष महत्व है। गर्भगृह में अखंड दीप जलता रहता है और नौ दिनों तक दुर्गा सप्तशती पाठ, अनुष्ठान और विशेष पूजा विधिपूर्वक होती है। सप्तमी की रात माता को 56 प्रकार के भोग अर्पित किए जाते हैं। वहीं, अष्टमी की रात 12 बजे के बाद तांत्रिक विधि से विशेष पूजा का आयोजन किया जाता है। इस मंदिर की सबसे अनूठी परंपरा गुप्तदान है। यहां किसी से चंदा नहीं लिया जाता, बल्कि श्रद्धालु अपनी इच्छा से दान करते हैं और अपनी पहचान उजागर नहीं करते। 365 दिनों में मंगलवार और शनिवार को यहां विशेष भीड़ उमड़ती है। नवरात्र की पहली पूजा से एक दिन पहले हजारों श्रद्धालु गंगा स्नान के लिए कहलगांव गंगा घाट के लिए निकल जाते हैं। कोई नंगे पांव 40 से 45 किलोमीटर की दूरी तय कर गंगाजल लेकर माता के चरणों में अर्पित करता है, तो कोई निजी वाहन से “जय माता दी” के जयकारे और भक्ति गीतों के साथ पहुंचता है। इस दौरान कई समाजसेवी संस्थाओं और राजनीतिक दलों की ओर से जगह-जगह श्रद्धालुओं के लिए चाय, शरबत और नींबू पानी, मेडिकल की व्यवस्था की जाती है। श्रद्धालुओं की आस्था और भक्ति से पूरा वातावरण गूंज उठता है। प्रशासन की ओर से सुरक्षा और व्यवस्था की विशेष निगरानी रखी जाती है। महागामा का यह दुर्गा मंदिर न केवल धार्मिक आस्था का केंद्र है, बल्कि सांस्कृतिक पहचान और गौरव का प्रतीक भी है।
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