होलिका दहन में है गलुरी बलुरी का पौराणिक महत्व
डांडा रोपड़ से बनाना होता है शुभारम्भ, बलुरी गलुरी बनाने में जुटे ग्रामीण लोग

नेशनल प्रेस टाइम्स, ब्यूरो
भरतपुर : भारत सांस्कृति विविधताओं से भरा हुआ देश है। जहां यहां की समय समय पर विभिन्न परम्पराओं को ने संस्कृति को बनाए रखा है। इस लिए हर त्यौहार को पूरी निष्ठा और अपनी- अपनी परम्पराओं के माध्यम से श्रद्धा अनुसार भक्ति भाव के साथ मनाया जाता है। जहां इन्हीं परम्पराओं में से एक है होली का त्यौहार। वहीं व्रज क्षेत्र की अनुठी परम्परा के अनुसार प्यार और स्नेह का रंगीला त्यौहार होली पर्व जैसे जैसे नजदीक आता जा रहा है वैसे ही भुसावर कस्बे सहित उपखण्ड क्षेत्र के विभिन्न गांवों के घरों में होलिका दहन की तैयारियां शुरू हो गई है। जहां पौराणिक मान्यताओं के अनुसार यहां महिलाएं गाय के गोबर से गलुरी- बलुरी (बडकुले) और ढाल बनाने में जुट गई है। वहीं पुष्पा,रैनू, लक्ष्मी जती, चंचल शर्मा महीलाओं ने जानकारी देते हुए बताया कि फाल्गुन मास लगते ही होलिका दहन की तैयारियां शुरू हो जाती है जिसमें गाय के गोबर से होरा,होली,गलुरी, बलुरी,चन्दा, सूरज, चूल्हा, चकला, बेलन, नारियल, कंघी, शीशा,डोरा बनाते हैं। और दूसरी तरफ महिला ममता, कल्पना,आशा ने बताया कि फाल्गुन मास में होलाष्टक लगने के बाद एकादशी जिसे रंगभरी एकादशी कहा जाता है, को गाय के गोबर से ढाल बनाई जाती है जिन्हें होलिका दहन वाले दिन हरी दूब, रोली, चावल,फल फूल नैबेध अर्पित करते हुए विधी विधान पूर्वक श्रद्धा भाव से पूजा अर्चना की जाती है। तत्पश्चात होलिका दहन वाले दिन बच्चे, युवक, युवतियां गलुरी- बलुरी (बडकुले) को धागे में पिरोकर माला में ग्यारह, इक्कीस,31 की आदि शुभ संख्या में बनाया जाता है और तलवार नुमा खांडे में लगाकर होलिका दहन वाले स्थान पर लें जाते हैं। और शेष बची गलुरी बलुरी को पात्र में सिर पर धारण कर सामुहिक महिलाएं भजन, कीर्तन करते हुए ले जाते हुए इन गलुरी- बलुरी (बडकुले) की एक-एक माला को रास्ते में बने मन्दिरों, देवालयों और धार्मिक स्थलों पर डालते हुए भगवान से परिवार में सुख-शांति समृद्धि एवं क्षेत्र में खुशहाली की मनोकामनाएं मांगी जाती है। वहीं शेष बची हुई गलुरी बलुरी को होलिका दहन वाले स्थान पर डाला जाता है जहां शुभ मुहूर्त में गणमान्य नागरिकों की उपस्थिति में विधी विधान पूर्वक श्रद्धा के साथ होलिका दहन किया जाता है।


