ललितपुर

अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस विशेष 8 मार्च

नारी को समाज में केवल करुणा और त्याग की प्रतिमूर्ति ही नहीं, बल्कि शक्ति, क्षमता और सृजन की प्रतीक के रूप में भी स्वीकार किया जाए

नेशनल प्रेस टाइम्स,ब्यूरो।
ललितपुर। समाज और सभ्यता के निर्माण में नारी की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण और आधारभूत रही है। जिस घर की स्त्रियां सत्य, करुणा और संस्कारों का पालन करती हैं, वही घर महान व्यक्तित्वों की जन्मभूमि बनता है। वास्तव में नारी केवल परिवार की संरक्षिका ही नहीं, बल्कि वह संस्कारों की प्रथम गुरु भी है। स्वतंत्र पत्रकार/ स्तम्भकार सिद्धार्थ शर्मा बताते हैं कि जब एक शिशु इस संसार में जन्म लेता है, तो प्रकृति उसे भूख की अनुभूति देती है और उसी क्षण माँ अपने वात्सल्य से उसे पोषण प्रदान करती है। माँ का दूध केवल शरीर को ही नहीं, बल्कि प्रेम, ममता और संवेदनाओं के बीजों को भी सींचता है। इसी कारण कहा गया है कि संसार में माँ से बढ़कर कोई गुरु नहीं होता। बच्चे के व्यक्तित्व, संस्कार और चरित्र के निर्माण में माँ की भूमिका सबसे अधिक प्रभावी होती है। समय के साथ समाज में नारी मुक्ति और समानता की बातें व्यापक रूप से उठी हैं। किन्तु केवल नारों और कानूनों से वास्तविक परिवर्तन संभव नहीं होता। आज भी समाज के अनेक हिस्सों में महिलाओं के प्रति संकीर्ण और पुरुषवादी मानसिकता दिखाई देती है। सामान्य बोलचाल में प्रयुक्त होने वाली गाली-गलौज में भी स्त्री के प्रति अपमानजनक दृष्टिकोण झलक जाता है। यह स्थिति दर्शाती है कि मानसिकता के स्तर पर अभी भी बदलाव की आवश्यकता है। भारतीय संविधान स्त्री और पुरुष को समान अधिकार प्रदान करता है। परंतु केवल समानता की घोषणा कर देना पर्याप्त नहीं है। वास्तविक समानता तब स्थापित होती है जब महिलाओं को शिक्षा, रोजगार और आत्मविकास के समान अवसर मिलें। लंबे समय तक घर की देखभाल और बच्चों के पालन-पोषण की जिम्मेदारी केवल महिला पर डाल देने से उसके व्यक्तित्व का विकास सीमित हो जाता है। इसलिए आवश्यक है कि परिवार के सभी सदस्य घरेलू कार्यों में सहयोग करें और महिलाओं को आगे बढऩे के लिए प्रोत्साहित करें। वर्तमान समाज में दहेज जैसी कुप्रथाएँ भी महिलाओं के सम्मान और अधिकारों पर प्रश्नचिह्न लगाती हैं। अनेक बेटियाँ बिना दहेज के अपने ससुराल में आकर प्रेम, समर्पण, सहिष्णुता और सामंजस्य से परिवार को संवारती हैं, परंतु भौतिकवादी समाज अक्सर इन गुणों की अनदेखी कर देता है। इसके विपरीत जो महिलाएँ शिक्षा और परिश्रम के बल पर आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनती हैं, वे परिवार और समाज दोनों के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। उनकी आत्मनिर्भरता पारिवारिक जीवन को सुदृढ़ बनाती है और समाज में सकारात्मक परिवर्तन की प्रेरणा देती है। अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस केवल उत्सव का अवसर नहीं, बल्कि यह आत्मचिंतन का भी दिन है। यह दिन हमें यह सोचने के लिए प्रेरित करता है कि हम महिलाओं को सम्मान, समान अवसर और सुरक्षित वातावरण प्रदान करने के लिए कितना प्रयास कर रहे हैं। वास्तविक प्रगति तभी संभव है जब समाज में नारी को केवल करुणा और त्याग की प्रतिमूर्ति ही नहीं, बल्कि शक्ति, क्षमता और सृजन की प्रतीक के रूप में भी स्वीकार किया जाए। जब हर घर में स्त्री का सम्मान होगा, तभी समाज में सच्चे अर्थों में विकास और मानवता का प्रकाश फैल सकेगा।
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